Monday, November 23, 2009

सुनहरी रेत का.घरौंदा

बचपन में रेत के घरौंदे तो हम सभी ने बनायें हैं ...वो सुनहरी..गीली रेत का गुम्बदनुमा घर बनाकर उसके भीतर हाथों से सुरंगें बनाना.....मैं और मेरी सहेली भी यूँ ही खेला करते थे...ये सुरंगें जब पूरी हो जातीं और दोनों के हांथ मिल जाते तो.......हमारी खुशी का कोई ठिकाना ही रहता था....किसी के हांथों से ये सुरंग बिखरती तो...उस पर रेत से ही वार होता...........कई-कई बार माँ से डांट पड़ती...."रेत में मत खेला करो.....पूरा सर रेत से भरा है.....तुम लोग घरौंदे रेत में बनाते हो या सर पर..."

इन रेत के घरौंदों की याद तो हमेशा ही नवरात्रि में ताज़ा हो जाती है...जब ज्वार बोने के लिए रेत लायी जाती है....सच कहूँ ,तो किसी न किसी तरह साल में एक ब़ार...यूँ ही रेत का घरौंदा बनाने का मौका मिल जाता है.....हर साल की तरह इस साल भी नवरात्रि में रेत लाई गई...घरौंदे बनाने की चाह फिर से जागी...भागकर रेत का थैला हाँथ में लिया....लेकिन ये क्या हुआ...मेरी सुनहरी रेत को...?....ये काली कब से हो गई....?............उस सुनहरी सी रेत का सुनहरा रंग कहीं खो गया था.....वो तो ऐसी लग रही थी;जैसे बरसों से बीमार हो और अब कमजोरी आ गई हो......और इस कमजोरी ने उसका अल्हड सुनहरा रंग उससे छीन लिया हो....जिसके कारण वो बेरंग...बेजान-सी हो गई है............

इस साल घरौंदा नही बनाया मैंने...जो परेशान हो उससे खेलकर उसे और परेशान तो नही करना चाहिए ?...........नौ दिनों तक वो घर पर रही...और फिर इसी आशा के साथ उसे विसर्जित किया...कि शायद उसे अपना खोया हुआ रूप वापस मिल जाए...............बाकी जगहों के बारे में तो पता नही लेकिन यहाँ तो ऐसी ही रेत मिलती है.....हो सकता है ये रेत का एक अलग रूप हो....या प्रदूषण का प्रकोप.....लेकिन मेरी तो यही इच्छा है की अब की नवरात्रि में,मैं अपनी सुनहरी सखी से फिर से मिल पाऊँ.......

Thursday, August 27, 2009

पापाजी,मान जाइये

पापाजी....बचपन में कितनी ही बार इनकी गोद में खेली...वे मुझे कई नामों से बुलाते...गुडिया,नन्ही राजकुमारी...और भी जाने क्या-क्या...?...पापाजी मुझे भाइयों से ज्यादा प्यार करते....पहली बार उनके साथ ही स्कूल गई...मुझे याद है..एक दिन मैंने उनके साथ सामान सप्लाई करने के लिए जाने की जिद की थी और वे मुझे ले कर भी गए थे...उन्हें मेरी वजह से परेशानी भी हुई थी...वो हमेशा मुझे प्रोत्साहित करते...जब पहली बार मैंने डर से गाना नही गया था...तब भी उन्होंने मुझे बहुत समझाया था...और मैं बाद में गा सकी...

दिन बीतते गए...जैसे-जैस बचपन दूर जाता गया पापाजी से भी दूरी बढती गई...उनसे उतनी खुलकर बातें नही होतीं थी,जितनी बचपन में हुआ करतीं थीं...पापाजी के साथ पता नही कैसे विचारों का मतभेद सामने आने लगा...उन्हें अक्सर वे बातें अच्छी नही लगतीं थीं जो मैं करती या करना चाहती...मैं कई बार वो काम नही करती जो उन्हें पसंद नही होते.....बीच में एक ऐसा वक्त आया जब मुझे लगने लगा कि पापाजी किसी भी काम को करने की इजाजत नही देंगे...मैं पहले ही उस काम के लिए मना कर देती...उनसे पूछे बगैर..पता नही शायद वो मुझे उस काम की इजाजत दे भी देते,लेकिन मैंने कोशिश ही नही की....वैसे उन्होंने मुझे कई बार ऐसे कामों की इजाजत भी दी..जिनके लिए मैंने "न"ही सोच लिया था..जैसे जींस पहनने की इजाज़त,डांडिया के लिए इजाज़त....

इस तरह से मैं उनसे कटती सी गई....और कुछ सालों बाद मेरी इस ग़लतफ़हमी ने उग्र रूप लिया...और मैं उनकी बातों का विरोध करने लगी...वैसे मैं वो काम करती नही थी...लेकिन उनसे बहस जरूर करने लगी थी...हर बार बेवजह की बहस करने के बाद अपने अन्दर एक ग्लानी जरूर महसूस करती थी...लेकिन गलती ये ही रही की उनसे कभी माफ़ी नही मांगी...बहस के बाद कई दिनों तक आपसी बातें कम होतीं....फ़िर सब कुछ सामान्य हो जाता...लेकिन महीने में दो-तीन बार ऐसा हो जाता था.....

कुछ दिनों में मेरी बदतमीजीयां बढ़ने लगीं...कई बार तो ऐसा होता की मेरा जवाब ही"नही"से शुरू होता...इस वजह से मैंने जल्द ही पापाजी को अपने ख़िलाफ़ कर लिया...मुझे तो इन बातों का एहसास ही नही होता..अगर मेरे भाई ने मेरा ध्यान इस और न दिलाया होता...और जब मुझे अपनी गलतियों का एहसास हुआ...तो मैं अपने आपको इस काबिल भी नही पाई कि मैं उनसे माफ़ी मांग सकूं...जानती हूँ की मुझे फ़िर भी माफ़ी मांगनी चाहिए थी...लेकिन मैंने यहाँ भी गलती की और उनसे कुछ नही बोली...

मैंने अपने आप में सुधार लाने की सोची..अब ये रास्ता आसान नही था...क्यूंकि मेरी आदत हो चुकी थी जवाब देने की और पापाजी को भी अब मेरी सारी बातें बुरी लगती थी...मैं अब तक अपनी कोशिश में लगीं हूँ...लेकिन मतभेद तो अब भी हैं....अब कई बार अगर मैं जवाब में सही बातें भीं कहतीं हूँ...तो उन्हें बुरी लगतीं हैं...उन्हें ऐसा लगता है कि मैं हर हाल में उनकी बात का विरोध ही करना चाहती हूँ....कई बार तो बहुत बुरा लगता है...वो इस तरह से मुझे ग़लत समझ लेते हैं कि विश्वास ही नही होता..कई बार रोना आ जाता है..लेकिन इसमे उनका कोई दोष भी तो नही है..ये सब मेरा ही किया धरा है...खैर मेरी कोशिश अब भी जारी है...कभी न कभी तो मैं इस बिगड़ी बात को जरूर बना पाऊँगी...

पापाजी से मैं सिर्फ़ इतना ही कहना चाहूंगी...कि मैं मानती हूँ की अक्सर गलती मेरी ही होती है..लेकिन कभी-कभी आप भी मेरी भावनाओं को समझने की कोशिश जरूर कीजियेगा...

Sunday, August 16, 2009

स्वतंत्रता दिवस

पिछले कुछ दिनों से "स्वाइन फ्लू"के डर ने सभी को यूँ घेरा था...कि कोई भी बिना किसी जरूरी काम के बाहर नही निकलना चाहता....लेकिन इसे भुला कर सभी ने बड़े उत्साह से"स्वतंत्रता दिवस"मनाया....मैं भी अपनी"हाऊसिंग सोसायटी"के द्वारा आयोजित समारोह में शामिल हुई...लहराते हुए तिरंगे को देखकर मन को एक अनोखा आनंद मिला...और सभी के साथ एक स्वर में "राष्ट्रगीत" गाकर अपने स्कूल के दिनों की यादें ताज़ा हो गयीं.....यहाँ भी भाषण हुआ लेकिन ये अन्य वर्षों से अलग रहा...इस बार देशभक्ति और शहीदों की बातें करने की बजाय "स्वाइन फ्लू" की बातें की गयीं.....

स्कूल के दिनों में अगस्त महिना शुरू होते ही १५ अगस्त की तैयारियां होने लगतीं थी....मार्चपास्ट,गाने,भाषण आदि में हम सभी व्यस्त रहते...१५ अगस्त के दिन भी सुबह ५ बजे उठकर जल्दी-जल्दी तैयार होकर स्कूल पहुँचकर सबसे आगे खड़े होना...ताकि हम सारे कार्यक्रम ठीक से देख सकें......जैसे ही तिरंगा फहराया जाता...उसमे लिपटे फूल आसपास गिर जाते...और सभी नज़रों ही नज़रों में अपने पसंदीदा फूलों को चुन लेते.....जैसे ही सारे कार्यक्रम खत्म होते..सब अपने पसंदीदा फूलों को उठाने के लिए कूद पड़ते....बाद में सभी को "संतरे के स्वादवाली कैंडी और बिस्किट"मिलते.....आज भी हर २६ जनवरी और १५ अगस्त को वो "संतरा गोली" बहुत याद आती है(वो संतरे के स्वाद की होती थी और गोल होती थी..इसलिए उसे "संतरा गोली"कहा करते थे)...बिस्किट तो मिल जाते हैं,लेकिन वैसी "संतरा गोली"आज तक फ़िर नही मिली...

स्कूल के दिन खत्म होने के बाद तो २६ जनवरी और १५ अगस्त में तिरंगा फहराते देखना भी मुश्किल होने लगा था..लेकिन पिछले कुछ सालों से फ़िर से ये सौभाग्य मिलने लगा है....इस वर्ष मन में एक खटका था कि पता नही "स्वाइन फ्लू"की वजह से ये कार्यक्रम कहीं रद्द न हो जाए...लेकिन लोगों ने "स्वतंत्रता दिवस"पर मानो अपने इस डर से भी आजादी पा ली थी...स्वाइन फ्लू से डरने की बजाय उससे बचाव के तरीके अपनाने की जरूरत है....

इस वर्ष स्वतंत्रता दिवस सभी के लिए एक स्वतंत्रता लेकर आया...काफ़ी दिनों बाद सभी से मिलकर बहुत अच्छा लगा....यहाँ भी हमने चॉकलेट खाई...... लेकिन मन "संतरा गोली" के स्वाद को नही भुला पाया....कुछ चीजें ऐसी होतीं हैं,जिनका स्थान कोई नही ले सकता...कोई भी ,महंगी से महंगी चॉकलेट भी उस ५० पैसे की "संतरा गोली"के स्वाद की बराबरी नही कर सकती......

Thursday, August 6, 2009

ट्यूशन का भूत

पिछले महीने से मैंने ट्यूशन पढाना शुरू किया....बच्चों के नखरे-बहाने देखकर मजा भी आता है...गुस्सा भी...उन्हें पढाते हुए मुझे भी अपने ट्यूशन के पहले दिन की याद आती है......ये सभी तो फ़िर भी पहले दिन अच्छी तरह से पढने आ गए थे......जब मैं पहले दिन ट्यूशन पढने गई थी....वो दिन तो आज भी नही भूली हूँ...

मेरा अक्षर ज्ञान और प्रारंभिक पढ़ाई तो घर पर ही हुई...मम्मी ने ही मुझे सिखाया...और बाकी कॉमिक्स से सीखी....लेकिन जब मेरे स्कूल में एडमिशन की बात आई तो पता नही क्यूँ?.....दाखिले के लिए जो टेस्ट देना था...उसकी तैयारी के लिए मम्मी-पापाजी ने मुझे ट्यूशन भेजना तय किया...पहले तो मुझे समझ ही नही आया कि अब तक तो मम्मी ही पढाते थे...तो मुझे टेस्ट कि तैयारी के लिए ट्यूशन क्यूँ भेजा जा रहा है....?

पहले दिन मम्मी मुझे छोड़ने गए....मैं तब तक कभी अजनबियों के पास अकेली नही गई थी....मम्मी तो मुझे छोड़कर घर आ गए....ट्यूशन वाली मैडम ने मम्मी को एक घंटे बाद आने को कहा....मम्मी के जाने के बाद उसने मुझे "ऐ टू जेड और अ से ज्ञ" तक लिखने कहा...मैंने कॉपी निकाली..लेकिन इससे पहले की मैं कुछ लिखती मैडम के घर की एक औरत जो की देखने में पागल लग रही थी..मेरे बगल में आकर बैठ गई....मेरी तो डर के मारे हालत ख़राब हो गई....लिखना तो दूर की बात थी मैं तो वहाँ से उसी वक्त भागना चाहती थी....

मैडम मुझे लिखने के लिए बोलती रही और मैं भगवान से मम्मी के जल्दी आने की प्रार्थना करती हुई रोती रही...आखिरकार भगवान ने मेरी सुनी..और मम्मी जरा जल्दी आ गए....मम्मी के आते ही मैडम ने शिकायतों की झड़ी लगा दी..."आप की बेटी को तो कुछ भी नही आता....लिखने के लिए बोली तो बैठकर रो रही है...आप तो बोल रहीं थीं..इसको सारे अक्षर आते हैं,लिख भी लेती है...ये कुछ भी नही जानती..."

उसकी बातों से मम्मी हैरान थे...मुझसे भी पूछा कि मैंने लिखा क्यूँ नही...लेकिन मैंने वहाँ कुछ नही कहा....खैर घर वापस आते समय जब मैंने मम्मी को सारी बात बताई...तो वो हंसने लगीं...और बाद में ये तय हुआ कि मम्मी ही मुझे पढायेंगे....मुझे ट्यूशन नही भेजा जायेगा....


बस ट्यूशन का वो पहला दिन ही मेरे ट्यूशन का आखिरी दिन रहा...उसके बाद से आज तक कभी भी मैं ट्यूशन नही गई...लेकिन वो एक दिन के ट्यूशन का अनुभव मुझसे भुलाए नही भूलता.....

Friday, July 3, 2009

रिक्शेवाले भइया


स्कूल दूर होने की वज़ह से हमें कई सालों तक रिक्शे की रोज़ सवारी का मौका मिला.इन ८-९ वर्षों में हमने कई रिक्शे बदले....इस वज़ह से हमें सारे रिक्शेवाले भइया का नाम तो याद नही है,लेकिन २ रिक्शावाले भइया हमें हमेशा याद रहेंगे....एक अपने नाम की वजह से और एक अपने अनोखे रिक्शे की वज़ह से।

जिन्हें नाम की वज़ह से याद करती हूँ वो है.....दिसम्बर.पता नही उन्हें ऐसा नाम क्यूँ मिला?लेकिन उनके नाम की वज़ह से उन्हें भूलना मुश्किल था....कभी आने में देर हो जाती थी तो किसी भी दूसरे रिक्शेवाले भइया से उनकी जानकारी आसानी से मिल जाती थी।

जब हम रिक्शे में जाया करते थे....तो एक रिक्शे में कम से कम आठ से ग्यारह बच्चे तो होते ही थे....ज्यादा हो सकते थे पर कम नही.इससे में हर एक सीट पर बैठना चाहता था....जिसके लिए हर एक के लिए सीट और टब पर बैठने का दिन निर्धारित किया करते थे....इसके लिए कई बार लड़ाई भी होती थी.सीट के सामने की पटिया केवल लकड़ी की होने के कारण जल्दी से कोई उसपर बैठना पसंद नही करता था....यही लड़ाई का सबसे अहम् मुद्दा होता था।

इन सभी लडाइयों का सामना हर एक रिक्शे में करना पड़ा.... रिक्शेवाले तो रिक्शा बदलने से बदल जाते थे पर रिक्शे वही लगते और सीट के हक़ की लड़ाई भी वही रहती नए चेहरों के साथ......लेकिन जब एक बार हमने रिक्शा बदला तो हमें रिक्शेवाले भइया के साथ-साथ रिक्शा भी बदला-बदला लगा.अगर मैं इसे एक शान्तिप्रिय रिक्शा कहूं तो शायद सही रहेगा.....यहाँ कभी भी सीट के लिए कोई लड़ाई नही होती थी.....कोई भी कहीं भी बैठने को तैयार रहता.कारण ये था कि ये शहर का एकमात्र ऐसा रिक्शा था,जिसमे सीट और पटिया में कोई भेद नही किया गया था....पूरा रिक्शा गद्देदार था.....ये रिक्शा था दुकालू भइया का.इसे उन्होंने अपनी इच्छानुसार ख़ुद बनवाया था ये बाकी रिक्शों से बड़ा भी था।

विसेस कुछ सालों बाद हमने रिक्शे जन छोड़ कर साइकिल कि सवारी शुरू करी....लेकिन रिक्शे की यादें साथ ही रहीं.स्कूल के लिए करीब घंटे भर पहले निकलना,छुट्टी के बाद भी वापस आने से पहले सबको घर छोड़ते हुए आने मिलता,कई नए दोस्त भी बनते....(मेरी एक ऐसी दोस्त रिक्शे में ही बनी थी,जो कि मेरे रिक्शा बदलने के बाद भी मुझे इत्तेफाक से हर रिक्शे में मिल ही जाती थी)बरसात में चारों ओर से मोटी प्लास्टिक से ढंके रिक्शे में बैठे-बैठे स्कूल से घर पहुंचना,रस्ते में पड़ने वाले पेडों से फूल-फल तोड़ने की कोशिश,पेपर के दिनों में सबके हाँथ में कॉपी और साथ पढ़ते-पढ़ते जाना,भइया से रिक्शे की रेस लगवाना और जीतने पर खुश होना,आपस में कितनी भी लड़ाई हो लेकिन कोई दूसरे रिक्शे का बच्चा अपने रिक्शे के बच्चे से लादे तो एकजूट होकर उसकी ओर से लड़ना...........ऐसी कितनी ही यादें हैं।


आपके रिक्शे कि तरह का कोई भी रिक्शा आज तक नही देखने मिला दुकालू भइया.....और न ही आपके नाम का कोई व्यक्ति मिला दिसम्बर भइया.आज भी आप अपने रिक्शे में बच्चों को स्कूल लेकर जाते होगे....आज भी सीट के झगडे होते होंगे....शायद कल वो भी इस तरह आपको याद करेंगे.

Saturday, June 6, 2009

सच्चा दोस्त

आज सुबह एक दोस्तों के ग्रुप को देखी.....हँसी-मजाक करते हुए,एक दुसरे की खिंचाई करते हुए....मुझे भी अपने स्कूल के वो दिन याद आ गए,जब हम सभी सहेलियों का ग्रुप इसी तरह की मस्ती करता था.हमारी क्लास डे शिफ्ट होने के कारण हमारा अधिकांश समय स्कूल में सहेलियों के साथ ही बीतता था....घर पर आकर भी स्कूल की बातें ही होतीं थी.....हम सभी सहेलियां तो एक-दुसरे का जन्मदिन भी स्कूल में ब्रेक के टाइम मनाया करतीं थी,क्यूंकि हममें से कईयों के घर काफी दूर थे.हम आठ सहेलियां साथ में पढ़ते,घूमते,खेलते,गाने गाते,अपनी खुशियों को बांटते,परेशानियों को भी सुलझाते.....इसी तरह हमारे दिन बीत रहे थे.तभी अचानक पापाजी का ट्रांसफर होने के कारण मुझे अपनी सहेलियों से बिछड़ना पड़ा....अपने हर दिन की कल्पना अपनी सहेलियों के साथ करने वाली मैं उनसे अलग होकर कैसे रहूंगी ये सोच भी नही पा रही थी.

अपनी सहेलियों से बिछड़कर मेरा हाल बुरा था...दिन भर रोती थी,सोचती रहती थी कि वो अभी क्या कर रही होंगी?,अपनी सहेलियों के जन्मदिन पर उनके लिए प्रार्थना करती.वैसे कुछ समय तो हमारा पत्र-व्यवहार भी चला....फ़िर दूरियां इन पर भी हावी हो गयीं.कुछ महीनों के बाद मैं भी संभल गई थी.उड़ीसा में होने के कारण मैंने अपनी आगे की पढ़ाई पत्राचार से की(इसमें मेरी मदद मेरी एक सहेली राखी ने पत्र के द्वारा की,उसे हमारी क्लास टीचर चतुर्वेदी मैडम ने जानकारी दीं थी)....पत्राचार से पढ़ाई करने के कारण मुझे केवल पेपर के समय ही नए दोस्त बनाने का मौका मिलता था...वैसे मैं कुछ लोगों से बात तो करती थी,लेकिन मैंने कभी नए दोस्त बनने की कोशिश ही नही की...शायद मैं अपनी सहेलियों कि जगह सुरक्षित रखना चाहती थी या मुझे नए दोस्त बनाकर उन्हें भी खोने का डर था.

पत्राचार से पढ़ाई करते हुए मुझे एक और परेशानी का सामना करना पड़ा....अकेले पढने का.वैसे स्कूल में मेरी कॉपी हमेशा अप-टू-डेट रहती थी,लेकिन पढ़ाई मैं केवल परीक्षा के समय करती थी...पेपर में कोई उत्तर नही भी आता था,तो क्लास में पढाये अनुसार उत्तर बना लिया करती थी....लेकिन अब तो मुझे ही पूरी पढ़ाई करनी होती थी...न कोई टीचर,न कोई क्लास.इस परेशानी का हल मैंने इस तरह निकाला कि एक ओर मैं ही टीचर बन जाती थी और दूसरी ओर विद्यार्थी भी मैं ही.जब पढ़ते-पढ़ते कुछ समझ में नही आता...तो ख़ुद ही टीचर कि तरह अपने आप को समझाती और समझ में आ जाता.पढ़ाई अच्छी तरह होने के साथ ही इससे एक और फायदा मिला.......मेरी ख़ुद से ही दोस्ती हो गई,जो की आज तक कायम है।

ख़ुद से दोस्ती करने से मेरा अकेलापन भी मुझे बहुत अच्छा लगने लगा...ऐसा नही है कि मैं अपनी सहेलियों को भूल गई...वो आज भी मुझे अज़ीज़ हैं.ख़ुद से दोस्ती करके मैंने मैंने खुश रहने के साथ-साथ अपनी गलतियों के बारे में जाना,अपनी परेशानियों को दूर करना सीखा,अब हर वक्त मेरी ये दोस्त मेरे साथ है और मुझे पता है की ये हमेशा मेरे साथ रहेगी चाहे परिस्थितियाँ कैसी भी हों।

जिंदगी में दोस्तों की बहुत अहमियत है.दोस्तों से जिंदगी खुशनुमा बनती है...लेकिन अगर दोस्तों से बिछड़ भी जाएँ,तो जिंदगी में आगे बढ़ना ही अच्छा है.दोस्त जरूरी है,लेकिन उनके सहारे ही जिंदगी जीने की कल्पना ग़लत है.जीवन में ऐसे कई मोड़ आते है,जहाँ आपके सभी दोस्त पीछे रह जाते है...आपके साथ हमेशा रहता है सिर्फ़ आपका वजूद.....और वही आपका सच्चा दोस्त है.

Monday, June 1, 2009

जो कह न सकी

माँ....एक ऐसा शब्द जिसे बच्चा सबसे पहले कहता है.मेरी माँ...जिन्हें मैंने हर वक्त अपने साथ पाया....मुश्किल पलों में सहेली के रूप में,जीवन की कठिन राहों में मार्गदर्शक के रूप में,अकेलेपन में सहारे के रूप में....पहली बार मम्मी को छोड़ कर कही गई तो वो था मेरे स्कूल का पहला दिन....उसके बाद रोज़ पाँच घंटों की दूरी रहती थी...रविवार को छोड़ कर।

स्कूल में नई सहेलियां जरूर बनीं,लेकिन मम्मी ही मेरी बेस्ट फ्रेंड रहीं;अपनी हर बातें मैंने उनके सिवा आज तक अपनी किसी फ्रेंड से नही बांटी...घर वापस आकर स्कूल की छोटी से छोटी बात उन्हें बताती थी...जैसे की उन्हें भी अपनी जानकारियों से अपडेट करना चाहती थी,इसी वजह से जब भी किसी सहेली से कोई बात हो जाया करती तो मम्मी से वो बात कहने में मुझे कभी भूमिका नही बनानी पड़ती थी....क्यूंकि वो सभी को मेरी बातों से जानते थे।

कभी कोई सवाल हल न हो रहा हो या किसी प्रश्न का उत्तर नही आ रहा हो...हल मम्मी के पास मिलता है.....मेरे विषय अलग होने के बाद भी मैं केवल सवाल पूछने से पहले नियमों को बता कर सवाल पूछती तो कोई न कोई हल जरूर मिल जाता नही तो कोई ऐसा सुझाव मिलता जिससे सवाल हल करने में सुविधा होती.एक निश्चित उम्र में जो बातें मुझे पता होनी चाहिए थीं,बड़ी ही सहजता से पता चलती गयीं....आज सोचती हूँ तो समझ आता है की परिस्थितियों को ही इतना सहज बनाया गया था की ये सभी बातें भी सहजता से समझ आतीं चलीं गई.

स्कूल के दिनों के बाद कई बार मम्मी से कई-कई महीनों अलग रहना पड़ा...फ़ोन पर भी बात नही होती थी,फ़िर भी वो साथ ही लगतीं थी.मुझे याद है जब मैं १२ वी की परीक्षा के लिए मामाजी के घर गई थी.....मैंने मम्मी के बारे में एक बुरा सपना देखा.....सुबह आँख खुली तो मैं रोते-रोते ही उठी.....सपना भी बहुत सुबह का था और मैंने सुन रखा था कि सुबह का सपना सच होता है....रो-रोकर मेरा हाल बुरा हो गया था.वैसे तो मैं बचपन से रोने के लिए मशहूर थी....खासकर मामाजी जब घर वापस आते तब मेरे नाम की एक धुन सीटी से बजाते थे और वो धुन सुनते ही मेरा रोना सुरु हो जाता था...इस वजह से मामाजी को नानीजी से डांट भी खानी पड़ती थी और वो कहते-"मैंने तो सिर्फ़ सीटी बजाई है".........लेकिन उस दिन का मेरा रोना देखकर सभी बहुत परेशान हो गए,काफी देर सभी ने मुझे समझाया तब जाकर मेरा रोना बंद हुआ....वैसे इस बात को काफ़ी दिनों तक आपस में सब ने सुनाया.वैसे ही एक बार जब मेरे पेपर के बीच में मम्मी मुझसे मिलने आए और जब वापस जाने लगे तो अचानक लगा की बाकि सारे पेपर छोड़ कर मम्मी के साथ चली जाऊं।

आज सोचती हूँ,तो पाती हूँ की कई बार मैंने मम्मी का दिल दुखाया है....कई बार बिना कुछ सोचे समझे जवाब दे दिया...कई बार अनजाने में मुह से कोई ऐसी बात निकल गई जो उन्हें तकलीफ दे गई और कुछ पलों बाद मुझे भी...मेरी गलती ये रही की मैंने इसके लिए भगवान् से तो माफ़ी मांगी लेकिन अपनी माँ से नही.मुझे पता है;इसके माँ तो माफ़ कर देंगी...लेकिन भगवान् नही!

कुछ महीनों पहले मम्मी की तबियत ख़राब हो गई थी....उन्हें हॉस्पिटल ले जाना पड़ा.....हॉस्पिटल पहुँचने पर उन्हें स्ट्रेचर पर सुलाया गया(उन्हें बहुत चक्कर आ रहे थे) इस हालत में मैंने अपनी माँ को नही पहले कभी नही देखा था....उस वक्त उन्हें देखकर कैसा लगा ये शायद बता नही पाऊँगी,बस इतना बता सकती हूँ कि,मुझे अपने आंसू छिपाने की नाकाम कोशिश करनी पड़ी.....मम्मी पाँच दिन बाद घर आए,लेकिन हॉस्पिटल में भी उन्हें हमेशा घर की चिंता रहती थी....सब ठीक से खाना खा रहे है की नही,काम का ज्यादा बोझ मत लेना,तुम लोग को फालतू में परेशान कर रही हूँ,वगेरह,वगेरह.मुझे भी घर पर सारे दिन बेचैनी रहती थी की कब रात हो और मैं मम्मी के पास जाऊँ।

आज तक मैंने बहुत गलतियां की हैं.....जिनके लिए मुझे बिना कुछ कहे माफ़ी मिली है.....मेरी माँ तो सबसे अच्छी माँ हैं.....पता नही मैं कैसी बेटी हूँ?इतना तो पता है की मैं एक परफेक्ट बेटी नही हूँ,जो अपनी माँ को हमेशा खुश रखे,उनसे कभी कोई बुरी बात न कहे,अपनी गलतियों के लिए माफ़ी मांगे....लेकिन हाँ,कहीं न कहीं मैं इस सुधार के रस्ते पर चलना तो चाह रही हूँ और मुझे आज भी जरूरत है एक मार्गदर्शक की.....अपनी माँ की।

इस पोस्ट के जरिये अपनी माँ को वो सभी बातें कहना चाहती हूँ,जो कभी उनसे रूबरू नही कर पाई.मेरी सभी गलतियों के लिए मुझे माफ़ करना....माँ.

Thursday, May 28, 2009

स्कूल का पहला दिन

आज अचानक अपने स्कूल का पहला दिन याद आ गया.छोटी होने के कारण कई फायदे तो थे लेकिन नुकसान भी था...मुझे घर पर सारे दिन अपने भाइयों के स्कूल से घर आने का इंतजार करना पड़ता था,इस बोरियत को मिटाने के लिए मम्मी मुझे अक्षर ज्ञान और लिखना सिखाते थे......इसी वजह से मैं स्कूल जाने से पहले ही कॉमिक्स पढने लगी थी या यूँ भी कहा जा सकता है की मैंने कॉमिक्स से ही पढ़ना सीखा.

आखिरकार मेरा स्कूल मैं दाखिला हुआ...मैंने पहले पहली का वार्षिक परीक्षा का पेपर हल किया,फ़िर दूसरी का दाखिले का....इस तरह मुझे सीधे दूसरी कक्षा में दाखिला मिला.स्कूल हमारे घर से बहुत दूर था....पहले दिन पापाजी मुझे छोड़ने आए और लेने भी.मेरी पहली क्लास टीचर थीं "ठाकुर मैडम",उन्होंने ने ही मेरी दोस्ती पहले दिन दो लड़कियों.....आयशा और पूनम से करवाई,ये दोनों पढने में बहुत होशियार थीं.

स्कूल का पहला दिन बहुत ही अच्छा रहा...मेरा तो स्कूल जाने का शौक ही पूरा हो गया था,वापस घर आकर मैंने अपनी स्कूल की सारी बातें मम्मी को बताई....स्कूल के पहले दिन से लेकर आज तक ये सिलसिला जारी है.मेरे रोज सारी बातें इस तरह से बताने के कारण मेरे दोनों भाई मुझे कहते-"तू मम्मी को साथ में स्कूल ले जाया कर,तो तुझे रोज़ आकर स्कूल पूरण नही गाना पड़ेगा"....लेकिन मैं नही सुधरी।

एक साल बाद पापाजी की पहचान वाली मैडम,जिन्होंने मेरे दाखिले में महत्वापोरना भोमिका निभाई थी,ने मुझे अपनी क्लास में ले लिया,जिसके कारण क्लास के बीच की दूरी....मेरे और मेरी सहेलियों के बीच भी आ गई.इस नई क्लास में कई लोगों से मेरी दोस्ती हुई...उनमे से एक थी....गाइड....क्यूंकि वर्मा मैडम(मेरी २ री क्लास टीचर)सिंगर थीं....और शायद पढाना उनका पार्ट टाइम जॉब था,तो हम गाइड से ही पढ़ते थे.मुझे आज तक समझ नही आया कि उन्होंने मुझे अपनी क्लास में लेकर अच्छा किया या बुरा?खैर यहाँ मुझसे जिन्होंने भी दोस्ती की,उन्होंने मुझे बहुत परेशान किया.ये लडकियां एक माफिया गैंग की तरह थीं....क्लास की बाकी लड़कियों से अपना काम पूरा करवाना,उनके टिफिन खाना,यहाँ तक की पेपर के समय भी ये यही सारे काम करती थीं.....बताने में बूरा तो लग रहा है,लेकिन हाँ मैं भी उन बाकी लड़कियों में शामिल थी.मम्मी के होते हुए मेरी पढ़ाई में कोई फर्क नही पड़ा और रिजल्ट में भी नही......लेकिन मेरी वजह से उनके रिजल्ट जरूर प्रभावित हुए।

जब मुझे स्कूल जाते हुए एक-दो हफ्ते हुए थे तभी वर्मा मैडम ने मुझे क्लास से स्टाफ-रूम में बुलाया....इस छोटे से रस्ते में ही मैंने अपनी बातों को सोच कर उसमें से अपनी गलतियां निकालने की कोशिश की,लेकिन फायदा नही हुआ,क्यूंकि स्टाफ-रूम आ गया था.अन्दर घुसते हुए ही मेरे आंसू मेरी आंखों के बिल्कुल पीछे छुप कर अपने बाहर आने का इंतजार करने लगे.तभी मैडम ने एक कागज हाथ में देते हुए कहा.."इसे पढो,ये गाना गाकर सुनाओ...मैं जैसा बोलती हूँ...वैसा-वैसा बोलो........सबसे अच्छा दिन इतवार ......बोलो",बस....मुझे याद नही की मैंने दो या चार कितनी लेने बोलीं.....हाँ गाना पूरा होने से पहले ही मेरे आंसू निकल आए....और मुझे मिला एक अच्छा मौका निकल गया...तब ही मैडम ने पापाजी से कह दिया था कि,"मैं आपकी बेटी को और कभी गाने को नही कहूँगी....मैंने कुछ भी नही किया और वो सिसक-सिसक कर रो रही थी"।

आख़िरकर मुझे ख़ुद ही पांचवी में मैडम को बोलना पड़ा कि,"मैडम मैं गाने में रहना चाहती हूँ"और हमने चार गाने गाये.इस तरह प्रायमरी ख़त्म हुई...अब हमें बगल वाली गर्ल्स स्कूल में दाखिला लेना था,जिसके बारे में हमारी स्कूल में अफवाह थी कि वहाँ के हॉल में पाँच लड़कियों कार भूत रहता है...जो कि दशहरा-दीपावली कि एक महीने की छुट्टी के दौरान वहाँ बंद हो गयीं थीं.हम इस स्कूल में एक बार पहले अपनी सहेली के साथ उसकी बहन की क्लास गाये थे....ये बहुत ही बड़ा स्कूल था,अगर उसकी बहन हमें बाहर छोड़ने नही आती तो शायद हम बाहर नही आ पाते।

इस नए स्कूल में पढने के लिए मैं बहुत खुश थी....साथ ही साथ भगवान् से प्रार्थना कर रही थी की किसी तरह मेरा अपनी इन सभी सहेलियों से पीछा छुट जाए और मैं नई सहेलियां बनाऊं,भगवान् ने मेरी सुन ली.इस नए स्कूल में,नई क्लास में मुझे एक नई सहेली भी मिली....कविता साहू....मेरे दोनों भाई मुझे इसका नाम ले लेकर चिढाते भी थे,क्यूंकि मैं इसके बारे में कोई मज़ाक बर्दास्त नही कर पाती थी.इसके अलावा भी मुझे यहाँ कई सहेलियां मिलीं और भी कई बातें यहाँ से जूडी हुई हैं....जिन्हें बाद में बताऊंगी.

Thursday, May 21, 2009

भेलवाले बाबा



कल मार्केट में एक भेल(मुर्रे में कुछ चटपटी चीजें मिलकर बनाई जाती है/गुपचुप की दूर की बहन)वाले को देख कर अचानक अपने स्कूल के सामने खड़े होने वाले भेल वाले बाबा की याद आ गई.......हमारे भेलवाले बाबा हम लड़कियों को "भवानी" कहकर बुलाते थे......उनका वो गाना"जो खायेगा हमारी भेल,कभी होगा नही वो फेल,चलती रहेगी उसकी रेल,धक्का पेल"सुनते ही हमारी हँसी छुट जाती थी.

हम उनसे कहा भी करते थे- बाबा!पढेंगे नही तो आपकी भेल तो पास नही कराएगी न?
उनका जवाब होता था-गजब करती हो भवानी!पढ़ना तो पड़ेगा ही लेकिन हमारी भेल से पड़ने के लिए ताकत आएगी?

......वो कभी भी किसी ऐसे लड़के को वहां खड़े नही होने दिया करते थे,जो की उन्हें ठीक नही लगता था.मेरी उनसे ख़ास पहचान थी...क्यूंकि भैया को अपनी स्कूल से मेरी स्कूल तक आने में टाइम लगता था और तब तक सब जा चुके होते थे,तो मैं उनके पास खड़े होकर भैया का इंतजार किया करती थी.अगर किसी दिन भैया की छुट्टी होती थी....तो भी वो मुझे बाबा के ठेले के पास ही मिलते थे.वैसे मैंने अपने पूरे स्कूल टाइम में चार-पॉँच बार ही उनकी भेल खाई....लेकिन फ़िर भी उसका स्वाद मेरे मन में अब भी मौजूद है.आज तक मैंने कभी उस स्वाद की भेल दोबारा नही चखी.

आज भी सोचती हूँ......क्या बाबा अब भी वहाँ बैठते होंगे?....क्या अब भी गर्ल्स स्कूल की लड़कियों को वही भेल खाने मिलती होगी?......क्या अब भी लडकियां उनके मुह से अपने लिए'भवानी'सुनकर हंस पड़ती होंगी?.......देखा जाए तो स्कूल में बस शिक्षक,दोस्त,पढ़ाई ही नही होती,बल्कि हमारे भेल वाले बाबा के बिना तो स्कूल याद ही नही आता...क्यूंकि मेरी स्कूल की यादें जब गेट से अन्दर घुस रही होतीं हैं बाबा तो वहीँ बाहर खड़े मिलते हैं,और कहते हैं....."गजब करती हो भवानी....आज भेल नही खाओगी"

(ये फोटो हमारे भेलवाले बाबा की नही है,लेकिन ये उनकी तरह ही दिख रहे हैं...और उनकी भेल भी...)

Tuesday, May 12, 2009

एक और धन्यवाद

पिछली बार मैंने अपने इतिहास के टीचर के बारे मैं लिखा था और आज मैं अपनी संस्कृत की टीचर के बारे मैं लिखना चाहती हूँ;वैसे ये करीब-करीब एक ही तरह की बात होगी लेकिन फ़िर भी....हम घर में बचपन से ही मंत्रों का जाप किया करते थे और हर रविवार हम यज्ञ करने गायत्री मन्दिर भी जाया करते थे ,सो बचपन से ही संस्कृत के लिए मन में एक चाह थी.जब हम छटवीं में गए तभी संस्कृत एक नए विषय के रूप में सामने आया;बाद में इसकी खूबी के साथ ही इसकी मुश्किलें भी सामने आयीं.एक भी बिंदी या विसर्ग छुट जाए तो सही जवाब भी ग़लत हो जाता है.खैर हमें इसका हल भी मिल गया......हमें संस्कृत पढ़ने के लिए जोगलेकर मैडम का साथ मिल गया.उन्होंने हमें बताया की किस तरह से बड़े-बड़े संस्कृत के शब्दों को संधि करके उनके अर्थ जाना जा सकता है और उनका उच्चारण भी सही किया जा सकता है.आज उनकी वजह से ही मैं आसानी से मंत्रों का उच्चारण कर पाती हूँ...और कुछ दिन पहले ही मैंने गायत्री यज्ञ में परिव्राजकों के साथ मंत्रों का उच्चारण करवाकर यज्ञ करवाया था .आज मैं तहेदिल से अपनी मैडम को धन्यवाद करती हूँ.

Thursday, May 7, 2009

बोरकर सर:जिन्होंने कभी बोर नही किया

आज अचानक ही अपने स्कूल की बात याद आ गई.जब से इतिहास हमारे पाठ्यक्रम में आया;तभी से ये एक बोझ सा लगने लगा...इतने सरे सन् और तारीखें याद करना बहुत ही मुश्किल लगता था.याद हो भी जाता तो पेपर के समय इधर-उधर हो जाता था.....प्लासी की लडाई में मुगलों के साम्राज्य का सन्....तो कभी अकबर के शासन काल का सन् जहांगीर का शासन काल के सन् से बदल जाता...पता नही वो ये सब देखते तो क्या सोचते????खैर जैसे-तैसे समय निकल रहे थे,कि हमें इतिहास पढाने के लिए एक नए टीचर मिले जो कि हमारी मैडम के रिटायर होने के बाद आए थे.हमें कभी भी ऐसा नही लगा था की हमारा इतिहास को पढने का तरीका बदलेगा...हम तो हमेशा ही उसे रट कर पेपर देने वाला विषय समझते थे ;लेकिन सर के आने पर अचानक ही हमारी इस सोच को जोर का झटका लगा....सर का नाम तो था,"बोरकर सर"(ये उनका सरनेम था)लेकिन इसके बावजूद उन्होंने कभी भी हमें बोर नही किया.पहले ही दिन उन्होंने कुछ इस तरह से इतिहास पढ़ाया कि पता ही नही चला कि हमेशा एक बोझ की तरह लगने वाले इस विषय से कब हमारी दोस्ती हो गयीं?सर पूरे पाठ को पढ़ाया करते थे और उसे छोटे-छोटे प्रश्नों के द्वारा विभाजित करके पूरे पाठ को हमारे विचारों में रमा दिया करते थे.इतनी आसानी से कभी तारीख और सन् याद हो जायेंगे कभी भी नही सोचा था.केवल इतिहास ही नही;बल्कि वे वर्तमान से सम्बंधित ऐसी जानकारी हमारे साथ बांटा करते थे ताकि हमें इतिहास के साथ ही वर्तमान की भी जानकारी रहे .आज ये लगता है कि अगर अद्धापक चाहें तो किसी भी विषय को विद्यार्थियों का मित्र बना सकते हैं.....ये हमारा सौभाग्य ही रहा कि हमें ऐसे कई अद्ध्यापकों का साथ मिला...आगे उनके बारे में भी लिखने कि कोशिश करूंगी.

Thursday, April 16, 2009

शिक्षा:ये क्या हुआ?

कल मेरी एक पहचान वाली ने मुझे अपने बेटे की हिन्दी मैं मदद करने के लिए कहा,क्यूंकि उसे हिन्दी नही आती और उसके बेटे की परीक्षा थी ,सो मैंने उसे शाम का समय दिया क्यूंकि मैं उस वक्त खाली होती हूँ.उसे पढ़ते हुए मुझे ये पता चला कि उसे अब तक मात्राओं का ज्ञान नही है ,न ही वो अक्षरों का ठीक से उच्चारण ही कर सकता है.जबकि अब साल खत्म हो चुके हैं और पढ़ाई कितनी आगे निकल चुकी है....और तो और अब एक हफ्ते बाद ही उसकी वार्षिक परीक्षा भी होने वाली है .ऐसे में मैंने तो उसे मात्राओं का ज्ञान करवाया और साथ ही अक्षरों का उच्चारण भी करना सिखाया.उसके जाने के बाद मैंने सोचा कि हमने कैसे ये सब सीखा था?तब याद आई हमारी मैडम कितनी सरलता से हमें अक्षर और मात्राओं का ज्ञान करवा देतीं थी.हाँ...यहाँ हम अपनी माँ को भी नही भूल सकते जो घर पर ही हमें अक्सर और मात्राओं का ज्ञान खेल-खेल में करा दिया करतीं थी.लेकिन आज मुझे कहीं न कहीं अपनी मैडम जैसी मदमों कि कमी खलने लगी है,जिस तरह से उन्होंने हिन्दी को हमारी एक अभिन्न सहेली बना दिया है.....वैसा आज देखने नही मिल रहा ,ऐसा नही है कि आज ऐसे टीचर नही है ....हैं लेकिन उतने नही है...वो इसे एक विषय कि तरह पढ़ते हैं...विषय के प्रति अपनापन जगा देने वाली वो बात कहीं गुम है..ऐसा सिर्फ़ हिन्दी के साथ ही नही बल्कि अन्य विषयों कि बात भी है...