Friday, May 20, 2011

उलझे रास्तों का नया सफ़र

अभी कुछ दिनों पहले अपने हाथ के कॉर्न के लिए होम्योपथिक डॉक्टर से मिली.....ये हॉस्पिटल विले पार्ले(मुंबई)में है और वहाँ की खास बात ये है कि वो आपकी बीमारी का इलाज करने तक ही मतलब नहीं रखते...वो पहले आपके नेचर को जानते हैं...कुछ सवालों से या फिर वो आपसे ही कहते हैं कि आप अपने बारे में कुछ बताइए...यही सब मेरे साथ भी किया गया....अपने बारे में काफी कुछ मैंने उन्हें बताया...जो शायद मैंने किसी से अब तक कहा भी नहीं था....उसके बाद डॉक्टर ने मेरे सामने कुछ नए सवाल रखे,जो थे तो मेरी ही ज़िन्दगी से जुड़े लेकिन कभी मेरे सामने आये नहीं थे.....उनके इन सवालों का साइड इफैक्ट ये हुआ कि मैं दिन भर तो उनके जवाब की तलाश में अपने दिमाग को उलझाती ही रही साथ ही मेरी रातों की नींद भी इन जवाबों को ढूंढने में खो गयीं....इस तरह से कुछ दिन परेशान रहने के बाद कुछ जवाब सामने आये...जिन्होंने मेरी उलझनों को कम तो किया...लेकिन अपने साथ कुछ सवाल भी ले आये...ये सवालों और जवाबों का रिश्ता ही कुछ ऐसा है...खुद तो साथ में रहते हैं, लेकिन इंसान को दुनिया से अलग कर देते हैं....बस यही हाल मेरा भी था...फिर डॉक्टर से मिली....उसे मेरे जवाबों से कुछ अच्छा लगा....वो एक मेडिकल कॉलेज है तो हमेशा वहां सिर्फ डॉक्टर ही नहीं स्टुडेंट भी मौजूद होते हैं अपनी नोटबुक के साथ....स्टुडेंट्स तो काफी इंटरेस्ट लेते हैं मुझ पर...शायद कभी ऐसा कोई पेशेंट मिला ही नहीं होगा उन्हें...

डॉक्टर भी कहाँ मानने वाले थे...जिंदगी के कुछ और पन्ने उनके सामने रखी और उन्होंने बदले में मेरे सामने कुछ नए सवाल रख दिए,इस बार सवालों का जवाब नहीं ढूँढना था....क्यूंकि जवाब मेरे पास ही थे,मैं सही रास्ता जानते हुए भी उस पर चल नहीं पा रही थी...और डॉक्टर का यही कहना था कि "आपने अपने बीते हुए समय से खुद को कुछ इस तरह से बाँध रखा है कि आगे ही नहीं बढ़ पा रही....वहाँ आपने एक हुक फंसा रखा है...बस उसको निकलकर आगे बढ़ो...पानी की तरह खुद को बहने दो...पानी कभी एक आकार में बंधा नहीं होता...और रुका हुआ पानी भी कभी साफ़ नहीं रहता...बस जैसा दिल करता है वैसा ही करो...और आप आज़ाद हो जाओगे...उसने कहा..."अब फैसला आपको करना है कि आप किस तरह से जीना चाहते हैं...अपने बीते हुए कल की तरह या एक आज़ाद पंछी की तरह..." अब बस उसी हुक की तलाश में थी....मिल तो गया पर उसमे जंग लगी हुई है...खोलने के लिए मेहनत लगानी होगी...मेहनत लगा तो रही हूँ..पर कभी-कभी थक कर बिलकुल टूट जाती हूँ...इसी तरह कुछ उलझी हुई सी एक बार और डॉक्टर से मिल आई....एक नयी बात उनके सामने रखी जो कोई जवाब नहीं बल्कि एक सवाल ही था....लेकिन उसने उसी सवाल को कुछ बड़ा करके मेरे ही सामने रख दिया....सवाल के दो जवाब हैं और मुझे एक चुनना है....कौन सा जवाब सही है और कौन सा ग़लत..?...आज सही लगने वाला जवाब कल ग़लत भी हो सकता है और ग़लत लगने वाला जवाब सही....

अब मेरा दिमाग कुछ ऐसा उलझा है कि मैं बस उसे ही पढ़ रही हूँ और कुछ भी नहीं..सबके साथ हूँ पर उनके साथ नहीं हूँ...सिर्फ अपने साथ हूँ...और कुछ यूँ उलझी हुई हूँ कि....पता नहीं रास्ता कहाँ मिलेगा....लेकिन कुछ भी हो मैं इस बार ये खोज नहीं रोकूंगी...मेरी जिंदगी का ये सबसे बड़ा सफ़र है...और मुझे इस पर सभी रास्ते खुद ही खोजने हैं...इस अनोखे सफ़र की शुरुवात हो चुकी है...मेरी कहानी में

2 comments:

डॉ॰ मोनिका शर्मा said...

यही उलझाने जीवन और खास बनती हैं..... जद्दोजहद सिखाती हैं....

atoot bandhan said...

जिन्दगी हमारे सामने कितनी उलझने पेश करती है , हम गांठे खोलते जाते है और आगे बढ़ते जाते हैं ... वंदना बाजपेयी