Friday, July 3, 2009

रिक्शेवाले भइया


स्कूल दूर होने की वज़ह से हमें कई सालों तक रिक्शे की रोज़ सवारी का मौका मिला.इन ८-९ वर्षों में हमने कई रिक्शे बदले....इस वज़ह से हमें सारे रिक्शेवाले भइया का नाम तो याद नही है,लेकिन २ रिक्शावाले भइया हमें हमेशा याद रहेंगे....एक अपने नाम की वजह से और एक अपने अनोखे रिक्शे की वज़ह से।

जिन्हें नाम की वज़ह से याद करती हूँ वो है.....दिसम्बर.पता नही उन्हें ऐसा नाम क्यूँ मिला?लेकिन उनके नाम की वज़ह से उन्हें भूलना मुश्किल था....कभी आने में देर हो जाती थी तो किसी भी दूसरे रिक्शेवाले भइया से उनकी जानकारी आसानी से मिल जाती थी।

जब हम रिक्शे में जाया करते थे....तो एक रिक्शे में कम से कम आठ से ग्यारह बच्चे तो होते ही थे....ज्यादा हो सकते थे पर कम नही.इससे में हर एक सीट पर बैठना चाहता था....जिसके लिए हर एक के लिए सीट और टब पर बैठने का दिन निर्धारित किया करते थे....इसके लिए कई बार लड़ाई भी होती थी.सीट के सामने की पटिया केवल लकड़ी की होने के कारण जल्दी से कोई उसपर बैठना पसंद नही करता था....यही लड़ाई का सबसे अहम् मुद्दा होता था।

इन सभी लडाइयों का सामना हर एक रिक्शे में करना पड़ा.... रिक्शेवाले तो रिक्शा बदलने से बदल जाते थे पर रिक्शे वही लगते और सीट के हक़ की लड़ाई भी वही रहती नए चेहरों के साथ......लेकिन जब एक बार हमने रिक्शा बदला तो हमें रिक्शेवाले भइया के साथ-साथ रिक्शा भी बदला-बदला लगा.अगर मैं इसे एक शान्तिप्रिय रिक्शा कहूं तो शायद सही रहेगा.....यहाँ कभी भी सीट के लिए कोई लड़ाई नही होती थी.....कोई भी कहीं भी बैठने को तैयार रहता.कारण ये था कि ये शहर का एकमात्र ऐसा रिक्शा था,जिसमे सीट और पटिया में कोई भेद नही किया गया था....पूरा रिक्शा गद्देदार था.....ये रिक्शा था दुकालू भइया का.इसे उन्होंने अपनी इच्छानुसार ख़ुद बनवाया था ये बाकी रिक्शों से बड़ा भी था।

विसेस कुछ सालों बाद हमने रिक्शे जन छोड़ कर साइकिल कि सवारी शुरू करी....लेकिन रिक्शे की यादें साथ ही रहीं.स्कूल के लिए करीब घंटे भर पहले निकलना,छुट्टी के बाद भी वापस आने से पहले सबको घर छोड़ते हुए आने मिलता,कई नए दोस्त भी बनते....(मेरी एक ऐसी दोस्त रिक्शे में ही बनी थी,जो कि मेरे रिक्शा बदलने के बाद भी मुझे इत्तेफाक से हर रिक्शे में मिल ही जाती थी)बरसात में चारों ओर से मोटी प्लास्टिक से ढंके रिक्शे में बैठे-बैठे स्कूल से घर पहुंचना,रस्ते में पड़ने वाले पेडों से फूल-फल तोड़ने की कोशिश,पेपर के दिनों में सबके हाँथ में कॉपी और साथ पढ़ते-पढ़ते जाना,भइया से रिक्शे की रेस लगवाना और जीतने पर खुश होना,आपस में कितनी भी लड़ाई हो लेकिन कोई दूसरे रिक्शे का बच्चा अपने रिक्शे के बच्चे से लादे तो एकजूट होकर उसकी ओर से लड़ना...........ऐसी कितनी ही यादें हैं।


आपके रिक्शे कि तरह का कोई भी रिक्शा आज तक नही देखने मिला दुकालू भइया.....और न ही आपके नाम का कोई व्यक्ति मिला दिसम्बर भइया.आज भी आप अपने रिक्शे में बच्चों को स्कूल लेकर जाते होगे....आज भी सीट के झगडे होते होंगे....शायद कल वो भी इस तरह आपको याद करेंगे.

Saturday, June 6, 2009

सच्चा दोस्त

आज सुबह एक दोस्तों के ग्रुप को देखी.....हँसी-मजाक करते हुए,एक दुसरे की खिंचाई करते हुए....मुझे भी अपने स्कूल के वो दिन याद आ गए,जब हम सभी सहेलियों का ग्रुप इसी तरह की मस्ती करता था.हमारी क्लास डे शिफ्ट होने के कारण हमारा अधिकांश समय स्कूल में सहेलियों के साथ ही बीतता था....घर पर आकर भी स्कूल की बातें ही होतीं थी.....हम सभी सहेलियां तो एक-दुसरे का जन्मदिन भी स्कूल में ब्रेक के टाइम मनाया करतीं थी,क्यूंकि हममें से कईयों के घर काफी दूर थे.हम आठ सहेलियां साथ में पढ़ते,घूमते,खेलते,गाने गाते,अपनी खुशियों को बांटते,परेशानियों को भी सुलझाते.....इसी तरह हमारे दिन बीत रहे थे.तभी अचानक पापाजी का ट्रांसफर होने के कारण मुझे अपनी सहेलियों से बिछड़ना पड़ा....अपने हर दिन की कल्पना अपनी सहेलियों के साथ करने वाली मैं उनसे अलग होकर कैसे रहूंगी ये सोच भी नही पा रही थी.

अपनी सहेलियों से बिछड़कर मेरा हाल बुरा था...दिन भर रोती थी,सोचती रहती थी कि वो अभी क्या कर रही होंगी?,अपनी सहेलियों के जन्मदिन पर उनके लिए प्रार्थना करती.वैसे कुछ समय तो हमारा पत्र-व्यवहार भी चला....फ़िर दूरियां इन पर भी हावी हो गयीं.कुछ महीनों के बाद मैं भी संभल गई थी.उड़ीसा में होने के कारण मैंने अपनी आगे की पढ़ाई पत्राचार से की(इसमें मेरी मदद मेरी एक सहेली राखी ने पत्र के द्वारा की,उसे हमारी क्लास टीचर चतुर्वेदी मैडम ने जानकारी दीं थी)....पत्राचार से पढ़ाई करने के कारण मुझे केवल पेपर के समय ही नए दोस्त बनाने का मौका मिलता था...वैसे मैं कुछ लोगों से बात तो करती थी,लेकिन मैंने कभी नए दोस्त बनने की कोशिश ही नही की...शायद मैं अपनी सहेलियों कि जगह सुरक्षित रखना चाहती थी या मुझे नए दोस्त बनाकर उन्हें भी खोने का डर था.

पत्राचार से पढ़ाई करते हुए मुझे एक और परेशानी का सामना करना पड़ा....अकेले पढने का.वैसे स्कूल में मेरी कॉपी हमेशा अप-टू-डेट रहती थी,लेकिन पढ़ाई मैं केवल परीक्षा के समय करती थी...पेपर में कोई उत्तर नही भी आता था,तो क्लास में पढाये अनुसार उत्तर बना लिया करती थी....लेकिन अब तो मुझे ही पूरी पढ़ाई करनी होती थी...न कोई टीचर,न कोई क्लास.इस परेशानी का हल मैंने इस तरह निकाला कि एक ओर मैं ही टीचर बन जाती थी और दूसरी ओर विद्यार्थी भी मैं ही.जब पढ़ते-पढ़ते कुछ समझ में नही आता...तो ख़ुद ही टीचर कि तरह अपने आप को समझाती और समझ में आ जाता.पढ़ाई अच्छी तरह होने के साथ ही इससे एक और फायदा मिला.......मेरी ख़ुद से ही दोस्ती हो गई,जो की आज तक कायम है।

ख़ुद से दोस्ती करने से मेरा अकेलापन भी मुझे बहुत अच्छा लगने लगा...ऐसा नही है कि मैं अपनी सहेलियों को भूल गई...वो आज भी मुझे अज़ीज़ हैं.ख़ुद से दोस्ती करके मैंने मैंने खुश रहने के साथ-साथ अपनी गलतियों के बारे में जाना,अपनी परेशानियों को दूर करना सीखा,अब हर वक्त मेरी ये दोस्त मेरे साथ है और मुझे पता है की ये हमेशा मेरे साथ रहेगी चाहे परिस्थितियाँ कैसी भी हों।

जिंदगी में दोस्तों की बहुत अहमियत है.दोस्तों से जिंदगी खुशनुमा बनती है...लेकिन अगर दोस्तों से बिछड़ भी जाएँ,तो जिंदगी में आगे बढ़ना ही अच्छा है.दोस्त जरूरी है,लेकिन उनके सहारे ही जिंदगी जीने की कल्पना ग़लत है.जीवन में ऐसे कई मोड़ आते है,जहाँ आपके सभी दोस्त पीछे रह जाते है...आपके साथ हमेशा रहता है सिर्फ़ आपका वजूद.....और वही आपका सच्चा दोस्त है.

Monday, June 1, 2009

जो कह न सकी

माँ....एक ऐसा शब्द जिसे बच्चा सबसे पहले कहता है.मेरी माँ...जिन्हें मैंने हर वक्त अपने साथ पाया....मुश्किल पलों में सहेली के रूप में,जीवन की कठिन राहों में मार्गदर्शक के रूप में,अकेलेपन में सहारे के रूप में....पहली बार मम्मी को छोड़ कर कही गई तो वो था मेरे स्कूल का पहला दिन....उसके बाद रोज़ पाँच घंटों की दूरी रहती थी...रविवार को छोड़ कर।

स्कूल में नई सहेलियां जरूर बनीं,लेकिन मम्मी ही मेरी बेस्ट फ्रेंड रहीं;अपनी हर बातें मैंने उनके सिवा आज तक अपनी किसी फ्रेंड से नही बांटी...घर वापस आकर स्कूल की छोटी से छोटी बात उन्हें बताती थी...जैसे की उन्हें भी अपनी जानकारियों से अपडेट करना चाहती थी,इसी वजह से जब भी किसी सहेली से कोई बात हो जाया करती तो मम्मी से वो बात कहने में मुझे कभी भूमिका नही बनानी पड़ती थी....क्यूंकि वो सभी को मेरी बातों से जानते थे।

कभी कोई सवाल हल न हो रहा हो या किसी प्रश्न का उत्तर नही आ रहा हो...हल मम्मी के पास मिलता है.....मेरे विषय अलग होने के बाद भी मैं केवल सवाल पूछने से पहले नियमों को बता कर सवाल पूछती तो कोई न कोई हल जरूर मिल जाता नही तो कोई ऐसा सुझाव मिलता जिससे सवाल हल करने में सुविधा होती.एक निश्चित उम्र में जो बातें मुझे पता होनी चाहिए थीं,बड़ी ही सहजता से पता चलती गयीं....आज सोचती हूँ तो समझ आता है की परिस्थितियों को ही इतना सहज बनाया गया था की ये सभी बातें भी सहजता से समझ आतीं चलीं गई.

स्कूल के दिनों के बाद कई बार मम्मी से कई-कई महीनों अलग रहना पड़ा...फ़ोन पर भी बात नही होती थी,फ़िर भी वो साथ ही लगतीं थी.मुझे याद है जब मैं १२ वी की परीक्षा के लिए मामाजी के घर गई थी.....मैंने मम्मी के बारे में एक बुरा सपना देखा.....सुबह आँख खुली तो मैं रोते-रोते ही उठी.....सपना भी बहुत सुबह का था और मैंने सुन रखा था कि सुबह का सपना सच होता है....रो-रोकर मेरा हाल बुरा हो गया था.वैसे तो मैं बचपन से रोने के लिए मशहूर थी....खासकर मामाजी जब घर वापस आते तब मेरे नाम की एक धुन सीटी से बजाते थे और वो धुन सुनते ही मेरा रोना सुरु हो जाता था...इस वजह से मामाजी को नानीजी से डांट भी खानी पड़ती थी और वो कहते-"मैंने तो सिर्फ़ सीटी बजाई है".........लेकिन उस दिन का मेरा रोना देखकर सभी बहुत परेशान हो गए,काफी देर सभी ने मुझे समझाया तब जाकर मेरा रोना बंद हुआ....वैसे इस बात को काफ़ी दिनों तक आपस में सब ने सुनाया.वैसे ही एक बार जब मेरे पेपर के बीच में मम्मी मुझसे मिलने आए और जब वापस जाने लगे तो अचानक लगा की बाकि सारे पेपर छोड़ कर मम्मी के साथ चली जाऊं।

आज सोचती हूँ,तो पाती हूँ की कई बार मैंने मम्मी का दिल दुखाया है....कई बार बिना कुछ सोचे समझे जवाब दे दिया...कई बार अनजाने में मुह से कोई ऐसी बात निकल गई जो उन्हें तकलीफ दे गई और कुछ पलों बाद मुझे भी...मेरी गलती ये रही की मैंने इसके लिए भगवान् से तो माफ़ी मांगी लेकिन अपनी माँ से नही.मुझे पता है;इसके माँ तो माफ़ कर देंगी...लेकिन भगवान् नही!

कुछ महीनों पहले मम्मी की तबियत ख़राब हो गई थी....उन्हें हॉस्पिटल ले जाना पड़ा.....हॉस्पिटल पहुँचने पर उन्हें स्ट्रेचर पर सुलाया गया(उन्हें बहुत चक्कर आ रहे थे) इस हालत में मैंने अपनी माँ को नही पहले कभी नही देखा था....उस वक्त उन्हें देखकर कैसा लगा ये शायद बता नही पाऊँगी,बस इतना बता सकती हूँ कि,मुझे अपने आंसू छिपाने की नाकाम कोशिश करनी पड़ी.....मम्मी पाँच दिन बाद घर आए,लेकिन हॉस्पिटल में भी उन्हें हमेशा घर की चिंता रहती थी....सब ठीक से खाना खा रहे है की नही,काम का ज्यादा बोझ मत लेना,तुम लोग को फालतू में परेशान कर रही हूँ,वगेरह,वगेरह.मुझे भी घर पर सारे दिन बेचैनी रहती थी की कब रात हो और मैं मम्मी के पास जाऊँ।

आज तक मैंने बहुत गलतियां की हैं.....जिनके लिए मुझे बिना कुछ कहे माफ़ी मिली है.....मेरी माँ तो सबसे अच्छी माँ हैं.....पता नही मैं कैसी बेटी हूँ?इतना तो पता है की मैं एक परफेक्ट बेटी नही हूँ,जो अपनी माँ को हमेशा खुश रखे,उनसे कभी कोई बुरी बात न कहे,अपनी गलतियों के लिए माफ़ी मांगे....लेकिन हाँ,कहीं न कहीं मैं इस सुधार के रस्ते पर चलना तो चाह रही हूँ और मुझे आज भी जरूरत है एक मार्गदर्शक की.....अपनी माँ की।

इस पोस्ट के जरिये अपनी माँ को वो सभी बातें कहना चाहती हूँ,जो कभी उनसे रूबरू नही कर पाई.मेरी सभी गलतियों के लिए मुझे माफ़ करना....माँ.

Thursday, May 28, 2009

स्कूल का पहला दिन

आज अचानक अपने स्कूल का पहला दिन याद आ गया.छोटी होने के कारण कई फायदे तो थे लेकिन नुकसान भी था...मुझे घर पर सारे दिन अपने भाइयों के स्कूल से घर आने का इंतजार करना पड़ता था,इस बोरियत को मिटाने के लिए मम्मी मुझे अक्षर ज्ञान और लिखना सिखाते थे......इसी वजह से मैं स्कूल जाने से पहले ही कॉमिक्स पढने लगी थी या यूँ भी कहा जा सकता है की मैंने कॉमिक्स से ही पढ़ना सीखा.

आखिरकार मेरा स्कूल में दाखिला हुआ...मैंने पहले पहली का वार्षिक परीक्षा का पेपर हल किया,फ़िर दूसरी के दाखिले का....इस तरह मुझे सीधे दूसरी कक्षा में दाखिला मिला.स्कूल हमारे घर से बहुत दूर था....पहले दिन पापाजी मुझे छोड़ने आए और लेने भी.मेरी पहली क्लास टीचर थीं "ठाकुर मैडम",उन्होंने ही मेरी दोस्ती पहले दिन दो लड़कियों.....आयशा और पूनम से करवाई,ये दोनों पढने में बहुत होशियार थीं.

स्कूल का पहला दिन बहुत ही अच्छा रहा...मेरा तो स्कूल जाने का शौक ही पूरा हो गया था,वापस घर आकर मैंने अपनी स्कूल की सारी बातें मम्मी को बताई....स्कूल के पहले दिन से लेकर आज तक ये सिलसिला जारी है.मेरे रोज सारी बातें इस तरह से बताने के कारण मेरे दोनों भाई मुझे कहते-"तू मम्मी को साथ में स्कूल ले जाया कर,तो तुझे रोज़ आकर स्कूल पुराण नही गाना पड़ेगा"....लेकिन मैं नही सुधरी।

एक साल बाद पापाजी की पहचान वाली मैडम,जिन्होंने मेरे दाखिले में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी,ने मुझे अपनी क्लास में ले लिया,जिसके कारण क्लास के बीच की दूरी....मेरे और मेरी सहेलियों के बीच भी आ गई.इस नई क्लास में कई लोगों से मेरी दोस्ती हुई...उनमे से एक थी....गाइड....क्यूंकि वर्मा मैडम(मेरी २ री क्लास टीचर)सिंगर थीं....और शायद पढाना उनका पार्ट टाइम जॉब था,तो हम गाइड से ही पढ़ते थे.मुझे आज तक समझ नही आया कि उन्होंने मुझे अपनी क्लास में लेकर अच्छा किया या बुरा?खैर यहाँ मुझसे जिन्होंने भी दोस्ती की,उन्होंने मुझे बहुत परेशान किया.ये लडकियां एक माफिया गैंग की तरह थीं....क्लास की बाकी लड़कियों से अपना काम पूरा करवाना,उनके टिफिन खाना,यहाँ तक की पेपर के समय भी ये यही सारे काम करती थीं.....बताने में बुरा तो लग रहा है,लेकिन हाँ मैं भी उन बाकी लड़कियों में शामिल थी.मम्मी के होते हुए मेरी पढ़ाई में कोई फर्क नही पड़ा और रिजल्ट में भी नही......लेकिन मेरी वजह से उनके रिजल्ट जरूर प्रभावित हुए।

जब मुझे स्कूल जाते हुए एक-दो हफ्ते हुए थे तभी वर्मा मैडम ने मुझे क्लास से स्टाफ-रूम में बुलाया....इस छोटे से रस्ते में ही मैंने अपनी बातों को सोच कर उसमें से अपनी गलतियां निकालने की कोशिश की,लेकिन फायदा नही हुआ,क्यूंकि स्टाफ-रूम आ गया था.अन्दर घुसते हुए ही मेरे आंसू मेरी आंखों के बिल्कुल पीछे छुप कर अपने बाहर आने का इंतजार करने लगे.तभी मैडम ने एक कागज हाथ में देते हुए कहा.."इसे पढो,ये गाना गाकर सुनाओ...मैं जैसा बोलती हूँ...वैसा-वैसा बोलो........सबसे अच्छा दिन इतवार ......बोलो",बस....मुझे याद नही की मैंने दो या चार कितनी लाइन बोलीं.....हाँ गाना पूरा होने से पहले ही मेरे आंसू निकल आए....और मुझे मिला एक अच्छा मौका निकल गया...तब ही मैडम ने पापाजी से कह दिया था कि,"मैं आपकी बेटी को और कभी गाने को नही कहूँगी....मैंने कुछ भी नही किया और वो सिसक-सिसक कर रो रही थी"।

आख़िरकर मुझे ख़ुद ही पांचवी में मैडम को बोलना पड़ा कि,"मैडम मैं गाने में रहना चाहती हूँ"और हमने चार गाने गाये.इस तरह प्रायमरी ख़त्म हुई...अब हमें बगल वाली गर्ल्स स्कूल में दाखिला लेना था,जिसके बारे में हमारी स्कूल में अफवाह थी कि वहाँ के हॉल में पाँच लड़कियों का भूत रहता है...जो कि दशहरा-दीपावली कि एक महीने की छुट्टी के दौरान वहाँ बंद हो गयीं थीं.हम इस स्कूल में एक बार पहले अपनी सहेली के साथ उसकी बहन की क्लास गये थे....ये बहुत ही बड़ा स्कूल था,अगर उसकी बहन हमें बाहर छोड़ने नही आती तो शायद हम बाहर नही आ पाते।

इस नए स्कूल में पढने के लिए मैं बहुत खुश थी....साथ ही साथ भगवान् से प्रार्थना कर रही थी की किसी तरह मेरा अपनी इन सभी सहेलियों से पीछा छुट जाए और मैं नई सहेलियां बनाऊं,भगवान् ने मेरी सुन ली.इस नए स्कूल में,नई क्लास में मुझे एक नई सहेली भी मिली....कविता साहू....मेरे दोनों भाई मुझे इसका नाम ले लेकर चिढाते भी थे,क्यूंकि मैं इसके बारे में कोई मज़ाक बर्दास्त नही कर पाती थी.इसके अलावा भी मुझे यहाँ कई सहेलियां मिलीं और भी कई बातें यहाँ से जुड़ी हुई हैं....जिन्हें बाद में बताऊंगी.

Thursday, May 21, 2009

भेलवाले बाबा



कल मार्केट में एक भेल(मुर्रे में कुछ चटपटी चीजें मिलकर बनाई जाती है/गुपचुप की दूर की बहन)वाले को देख कर अचानक अपने स्कूल के सामने खड़े होने वाले भेल वाले बाबा की याद आ गई.......हमारे भेलवाले बाबा हम लड़कियों को "भवानी" कहकर बुलाते थे......उनका वो गाना"जो खायेगा हमारी भेल,कभी होगा नही वो फेल,चलती रहेगी उसकी रेल,धक्का पेल"सुनते ही हमारी हँसी छुट जाती थी.

हम उनसे कहा भी करते थे- बाबा!पढेंगे नही तो आपकी भेल तो पास नही कराएगी न?
उनका जवाब होता था-गजब करती हो भवानी!पढ़ना तो पड़ेगा ही लेकिन हमारी भेल से पड़ने के लिए ताकत आएगी?

......वो कभी भी किसी ऐसे लड़के को वहां खड़े नही होने दिया करते थे,जो की उन्हें ठीक नही लगता था.मेरी उनसे ख़ास पहचान थी...क्यूंकि भैया को अपनी स्कूल से मेरी स्कूल तक आने में टाइम लगता था और तब तक सब जा चुके होते थे,तो मैं उनके पास खड़े होकर भैया का इंतजार किया करती थी.अगर किसी दिन भैया की छुट्टी होती थी....तो भी वो मुझे बाबा के ठेले के पास ही मिलते थे.वैसे मैंने अपने पूरे स्कूल टाइम में चार-पॉँच बार ही उनकी भेल खाई....लेकिन फ़िर भी उसका स्वाद मेरे मन में अब भी मौजूद है.आज तक मैंने कभी उस स्वाद की भेल दोबारा नही चखी.

आज भी सोचती हूँ......क्या बाबा अब भी वहाँ बैठते होंगे?....क्या अब भी गर्ल्स स्कूल की लड़कियों को वही भेल खाने मिलती होगी?......क्या अब भी लडकियां उनके मुह से अपने लिए'भवानी'सुनकर हंस पड़ती होंगी?.......देखा जाए तो स्कूल में बस शिक्षक,दोस्त,पढ़ाई ही नही होती,बल्कि हमारे भेल वाले बाबा के बिना तो स्कूल याद ही नही आता...क्यूंकि मेरी स्कूल की यादें जब गेट से अन्दर घुस रही होतीं हैं बाबा तो वहीँ बाहर खड़े मिलते हैं,और कहते हैं....."गजब करती हो भवानी....आज भेल नही खाओगी"

(ये फोटो हमारे भेलवाले बाबा की नही है,लेकिन ये उनकी तरह ही दिख रहे हैं...और उनकी भेल भी...)

Tuesday, May 12, 2009

एक और धन्यवाद

पिछली बार मैंने अपने इतिहास के टीचर के बारे मैं लिखा था और आज मैं अपनी संस्कृत की टीचर के बारे मैं लिखना चाहती हूँ;वैसे ये करीब-करीब एक ही तरह की बात होगी लेकिन फ़िर भी....हम घर में बचपन से ही मंत्रों का जाप किया करते थे और हर रविवार हम यज्ञ करने गायत्री मन्दिर भी जाया करते थे ,सो बचपन से ही संस्कृत के लिए मन में एक चाह थी.जब हम छटवीं में गए तभी संस्कृत एक नए विषय के रूप में सामने आया;बाद में इसकी खूबी के साथ ही इसकी मुश्किलें भी सामने आयीं.एक भी बिंदी या विसर्ग छुट जाए तो सही जवाब भी ग़लत हो जाता है.खैर हमें इसका हल भी मिल गया......हमें संस्कृत पढ़ने के लिए जोगलेकर मैडम का साथ मिल गया.उन्होंने हमें बताया की किस तरह से बड़े-बड़े संस्कृत के शब्दों को संधि करके उनके अर्थ जाना जा सकता है और उनका उच्चारण भी सही किया जा सकता है.आज उनकी वजह से ही मैं आसानी से मंत्रों का उच्चारण कर पाती हूँ...और कुछ दिन पहले ही मैंने गायत्री यज्ञ में परिव्राजकों के साथ मंत्रों का उच्चारण करवाकर यज्ञ करवाया था .आज मैं तहेदिल से अपनी मैडम को धन्यवाद करती हूँ.

Thursday, May 7, 2009

बोरकर सर:जिन्होंने कभी बोर नही किया

आज अचानक ही अपने स्कूल की बात याद आ गई.जब से इतिहास हमारे पाठ्यक्रम में आया;तभी से ये एक बोझ सा लगने लगा...इतने सरे सन् और तारीखें याद करना बहुत ही मुश्किल लगता था.याद हो भी जाता तो पेपर के समय इधर-उधर हो जाता था.....प्लासी की लडाई में मुगलों के साम्राज्य का सन्....तो कभी अकबर के शासन काल का सन् जहांगीर का शासन काल के सन् से बदल जाता...पता नही वो ये सब देखते तो क्या सोचते????खैर जैसे-तैसे समय निकल रहे थे,कि हमें इतिहास पढाने के लिए एक नए टीचर मिले जो कि हमारी मैडम के रिटायर होने के बाद आए थे.हमें कभी भी ऐसा नही लगा था की हमारा इतिहास को पढने का तरीका बदलेगा...हम तो हमेशा ही उसे रट कर पेपर देने वाला विषय समझते थे ;लेकिन सर के आने पर अचानक ही हमारी इस सोच को जोर का झटका लगा....सर का नाम तो था,"बोरकर सर"(ये उनका सरनेम था)लेकिन इसके बावजूद उन्होंने कभी भी हमें बोर नही किया.पहले ही दिन उन्होंने कुछ इस तरह से इतिहास पढ़ाया कि पता ही नही चला कि हमेशा एक बोझ की तरह लगने वाले इस विषय से कब हमारी दोस्ती हो गयीं?सर पूरे पाठ को पढ़ाया करते थे और उसे छोटे-छोटे प्रश्नों के द्वारा विभाजित करके पूरे पाठ को हमारे विचारों में रमा दिया करते थे.इतनी आसानी से कभी तारीख और सन् याद हो जायेंगे कभी भी नही सोचा था.केवल इतिहास ही नही;बल्कि वे वर्तमान से सम्बंधित ऐसी जानकारी हमारे साथ बांटा करते थे ताकि हमें इतिहास के साथ ही वर्तमान की भी जानकारी रहे .आज ये लगता है कि अगर अद्धापक चाहें तो किसी भी विषय को विद्यार्थियों का मित्र बना सकते हैं.....ये हमारा सौभाग्य ही रहा कि हमें ऐसे कई अद्ध्यापकों का साथ मिला...आगे उनके बारे में भी लिखने कि कोशिश करूंगी.