

कल मार्केट में एक भेल(मुर्रे में कुछ चटपटी चीजें मिलकर बनाई जाती है/गुपचुप की दूर की बहन)वाले को देख कर अचानक अपने स्कूल के सामने खड़े होने वाले भेल वाले बाबा की याद आ गई.......हमारे भेलवाले बाबा हम लड़कियों को "भवानी" कहकर बुलाते थे......उनका वो गाना"जो खायेगा हमारी भेल,कभी होगा नही वो फेल,चलती रहेगी उसकी रेल,धक्का पेल"सुनते ही हमारी हँसी छुट जाती थी.
हम उनसे कहा भी करते थे- बाबा!पढेंगे नही तो आपकी भेल तो पास नही कराएगी न?
उनका जवाब होता था-गजब करती हो भवानी!पढ़ना तो पड़ेगा ही लेकिन हमारी भेल से पड़ने के लिए ताकत आएगी?
......वो कभी भी किसी ऐसे लड़के को वहां खड़े नही होने दिया करते थे,जो की उन्हें ठीक नही लगता था.मेरी उनसे ख़ास पहचान थी...क्यूंकि भैया को अपनी स्कूल से मेरी स्कूल तक आने में टाइम लगता था और तब तक सब जा चुके होते थे,तो मैं उनके पास खड़े होकर भैया का इंतजार किया करती थी.अगर किसी दिन भैया की छुट्टी होती थी....तो भी वो मुझे बाबा के ठेले के पास ही मिलते थे.वैसे मैंने अपने पूरे स्कूल टाइम में चार-पॉँच बार ही उनकी भेल खाई....लेकिन फ़िर भी उसका स्वाद मेरे मन में अब भी मौजूद है.आज तक मैंने कभी उस स्वाद की भेल दोबारा नही चखी.
आज भी सोचती हूँ......क्या बाबा अब भी वहाँ बैठते होंगे?....क्या अब भी गर्ल्स स्कूल की लड़कियों को वही भेल खाने मिलती होगी?......क्या अब भी लडकियां उनके मुह से अपने लिए'भवानी'सुनकर हंस पड़ती होंगी?.......देखा जाए तो स्कूल में बस शिक्षक,दोस्त,पढ़ाई ही नही होती,बल्कि हमारे भेल वाले बाबा के बिना तो स्कूल याद ही नही आता...क्यूंकि मेरी स्कूल की यादें जब गेट से अन्दर घुस रही होतीं हैं बाबा तो वहीँ बाहर खड़े मिलते हैं,और कहते हैं....."गजब करती हो भवानी....आज भेल नही खाओगी"
(ये फोटो हमारे भेलवाले बाबा की नही है,लेकिन ये उनकी तरह ही दिख रहे हैं...और उनकी भेल भी...)