Wednesday, March 13, 2024

ज़िंदगी:माँ के बाद














 माँ के जाने के बाद एक समय ऐसा भी गुज़रा जब मैं सबके साथ होते हुए भी पूरी तरह से अकेली थी। ऐसा कई- कई बार अब भी होता है। जब मुझे समझ ही नहीं आता कि आख़िर मैं अपनी बातें करने के लिए किसके पास जाऊँ। ऐसा नहीं है कि परिवार में कोई भी मेरे साथ नहीं है बल्कि ये कुछ इस तरह से है कि आप एक निश्चित इंसान से ही अपनी बातें कहते हैं। वो आपको सुनता है और समझता भी है। पहले मुझे लगता था कि मैं अंतर्मुखी हूँ लेकिन मैं ढेर सारी बातें करने वालों में से हूँ। ऐसे लोगों को अंतर्मुखी तो नहीं कहा जाता है। फिर भी कई ऐसी बातें हैं जो मैं किसी से कहना नहीं चाहती या कहूँ कि कह ही नहीं पाती। 

ढेरों बातों में कई बातें होती हैं लेकिन वो नहीं जो वास्तव में की जानी चाहिए। पहले ऐसी बातों को लिख लेना मेरे लिये एक समाधान की तरह होता था। पर अब तो उन्हें लिखने में भी मुझे उलझन ही रहती है। ख़ैर बात यहाँ शुरू हुई थी माँ के जाने के बाद मिले अकेलेपन से। मैं कई मौक़ों पर ये चाहती रही हूँ कि मुझे अकेले बहुत कुछ करने दिया जाये या कहीं जाने दिया जाए। जो मैं नहीं चाहती थी वो ये कि मैं इस तरह से अकेली होऊँ। पर आपके चाहने या न चाहने से कोई बात नहीं बनती। जो होना होता है वो होता ही है। 

ख़ैर ज़िंदगी अब दो भागों में बँट गई है, माँ के साथ की ज़िंदगी और माँ के बाद की ज़िंदगी। कहना ही होगा कि माँ के बाद की ज़िंदगी ने मुझे बहुत से पाठ पढ़ाए। माँ ने मुझे अपने आँचल में इस तरह से समेटा हुआ था कि उनकी छाँव में मैंने भले ही ज़िंदगी के कठोरतम समय को गुज़ारा लेकिन माँ का साथ था तो वो दिन भी किसी परीक्षा से बीत गये। पर माँ के जाने के बाद से ही जीवन एक अलग ही चुनौती का नाम बनता जा रहा है। जब- जब लगता है कि इस चुनौती को मैंने कहीं न कहीं पार पाने योग्य ख़ुद को बना लिया है। तभी एक नयी चुनौती सामने आती है। 

बचपन से या कहूँ जब से मुझे याद है तभी से मैं अपने जीवन में आने वाली हर बाधाओं को अपनाकर उन्हें मेहनत से या जूझते हुए पार कर पायी हूँ। पर इन दिनों ये सारी चुनौतियाँ मुझे उलझाती हैं। माँ के जाने के बाद कुछ डेढ़ साल तक तो मुझे यही महसूस हुआ कि चुनौतियों के क़ब्ज़े में मैं पूरी तरह उलझकर रह गई हूँ। पर अब मैंने मौन धरकर चुनौती को पार करने का साहस अपनाया है। मुझे कई बार कुछ कह देने के कारण मुश्किलों का सामना करना होता है। ख़ासतौर से आसपास की चीज़ें न बिगड़ने देने का प्रयास मेरे लिये ढेर सारी मुश्किलें ले आता है। 

माँ के जाने के बाद मैं काफ़ी कुछ सीख रही हूँ। बहुत कुछ मैंने अचीव भी किया है। काश ये सब उनके साथ सीधे तौर पर बाँटा जा सकता। कभी - कभी जब उनकी कोई तस्वीर मेरे सामने आती है तो मैं याद करती हूँ कि आख़िर उस दिन क्या था? उस दिन जब ये तस्वीर खींची गई तब माँ क्या कह रही थीं? और भी न जाने क्या- क्या। शायद ये सिलसिला ज़िंदगी भर रहेगा...मेरी कहानी में...


फोटो: गूगल से साभार 

Monday, November 20, 2023

काश...सपने सच हो जाते


 कल सपने में माँ आयीं थीं। पिछले कुछ दिनों से मेरी तबियत ठीक नहीं है तो ऐसे में माँ याद आ ही जाती हैं। वैसे जब डेढ़ साल पहले माँ इस दुनिया में हमें छोड़कर चली गयीं थीं। तब शायद उन्होंने बहुत कुछ सोचा नहीं होगा। यूँ तो हम भी कुछ सोच नहीं पाए थे। पर वो बातें कभी और। आज तो सपने की बात करनी है। माँ के जाने के बाद से माँ मेरे सपनों में कम- कम ही आयीं लेकिन जब- जब मैं परेशान होती हूँ वो आती हैं। कई- कई बार यूँ भी किसी रोज़ आती हैं। 

ख़ैर कल सपने में जब माँ आयीं तो मैं उस समय कहीं जाने की तैयारी में थी। जहाँ तक मुझे याद आता है मैं कहीं पढ़ने जाने के लिए बैग के साथ तैयार थी। मैंने लिफ़्ट में कदम रखा और नीचे उतर गयी। तब तक माँ से मैं मिल नहीं पायी थी। फिर मुझे याद आया कि शायद मैं कुछ सामान ऊपर ही भूल आयी हूँ। मैंने वापस लिफ़्ट में कदम रखा और बिना लिफ़्ट का दरवाज़ा बंद हुए सीधे घर पहुँच गयी। 

माँ से कुछ बातें की। हमने एक- दूसरे को अपना ख़याल रखने की हिदायत दी और मैं घर से निकल चली। इस बार भी लिफ़्ट ने दरवाज़ा बंद नहीं किया। ख़ैर जब मैं पहुँची तब तक मेरे साथ जाने वाली लड़की निकल चुकी थी। टाइम देखकर मुझे पता चला कि मेरी ट्रेन भी जा चुकी है। घर वापस जाना यानी अकेले सफ़र करने के अपने मौक़े को खोना (ये बातें सपने में भी याद रहती हैं)। 

मैं जाने कहाँ रुक गयी। शायद किसी होटल में बाद में मैंने यहाँ से माँ को कॉल किया और उनसे बात करके उन्हें सब बताया। जिस तरह मैं उन्हें पहले सब बताया करती थी। हमने तय किया कि माँ मुझे मिलेंगी और मैं उनके साथ कहीं घूम आऊँगी। वैसे इसके बाद मुझे सपने में याद आया कि माँ तो हैं ही नहीं (ये बातें भी मुझे सपने तक में याद आ जाती हैं)। मैंने माँ को ही इस बारे में बताया कि वो नहीं हैं पर अब मैं उनसे बात कर पा रही हूँ। 

शायद किसी को ये सपना बेवक़ूफ़ाना लगे लेकिन मुझे बहुत प्यारा लगा, संजोने लायक। तो आज इतना ही फिर कभी किसी नयी बात को जोड़ूँगी...मेरी कहानी में..

तस्वीर: गूगल से साभार


Wednesday, November 28, 2012

कार्तिक पूर्णिमा: बहते दिये और लंगर



कार्तिक पूर्णिमा...सिर्फ दो बातों की याद दिलाती है...सुबह अंधेरे मे नदी-तालाबों मे तैरते दीयों की रोशनी और गुरुनानक जयंती मे गुरुद्वारे मे होने वाले लंगर की...

ये दोनों यादें बचपन से जुड़ी हुई खास यादों का हिस्सा हैं...मुझे याद है जब मैं स्कूल मे थी तब मेरी कई पंजाबी सहेलियाँ थीं...उनके साथ ही मैं हर गुरुनानक जयंती मे गुरुद्वारे ज़रूर जाती....वहाँ का माहौल ही मुझे बहुत पसंद आता...वहाँ कभी किसी मे कोई भेद नहीं होता..और एक बात जो मुझे हमेशा अच्छी लगती वो ये की रोटी हमेशा हाथ फैलाकर लेनी पड़ती...जो इस बात का अहसास कराती की कोई है जो हमें खाना दे रहा है...कोई हमसे भी बड़ा है...जिसके कारण आज हमारे पेट भरे हुये हैं...और दूसरी बात हम वहाँ घंटों खड़े होकर रोटियाँ बनते देखते...कैसे एक साथ इतने लोग काम मे लगे होते...आटा लगाने के लिए ,रोटियाँ बेलने के लिए और रोटियाँ सेंकने के लिए चढ़ा बड़ा सा तवा तो हमेशा मेरी नज़रों मे होता....और खाना हमेशा स्वादिष्ट ही होता...

कुछ साल बाद जब हम अपने गाँव आए तो यहाँ कई लोग कार्तिक स्नान किया करते थे...और जो नहीं कर पाते वो आखिरी पाँच दिन स्नान करते...और सभी कार्तिक पूर्णिमा के दिन सुबह 4-5 बजे,सूर्योदय से पहले नदी और तालाबों मे जाकर पत्तों के दोने मे आते के दिये जलाकर उनकी पूजा करके नदी मे छोडते...मैं भी मम्मी के साथ हर बार जाती...अंधेरे मे एक साथ नदी मे बहते दिये देखना भी अपने आप मे एक अनोखा अनुभव होता था...और उससे भी ज़्यादा अपने दिये को उन सभी दीयों के साथ जाते देखना तो और भी खुशी दे जाता...कई लोग कागज़ की रंग बिरंगी नाव मे अपने दिये रखते,कुछ लोग केले के पेड़ के तने पर दिये रखते...नदियों मे दिये तैरने के लिए हम ठंड की परवाह भी नही करते थे...बहुत अच्छे थे वो दिन....

यहाँ आने के बाद मैंने भी कई बार कार्तिक स्नान किया..पर यहाँ कभी न तो दिये बहाने जा सकी और न ही गुरुद्वारे पर लंगर खाने गयी...पर ये दोनों यादें हमेशा मेरे साथ हैं और कार्तिक पूर्णिमा के आते ही हर साल नयी हो जाती हैं...ये बहुत ही खास यादें हैं...मेरी कहानी मे 

Tuesday, September 20, 2011

मिलन : हमारा-तुम्हारा

कुछ दिनों पहले ही मुझे अपनी एक पुरानी सहेली नेट पर मिली....और उससे एक दूसरी सहेली का नंबर मिला और उससे दूसरी का...बस इस तरह मुझे अपनी सभी सहेलियों के नम्बर मिले और उनके बारे में भी पता चला...मेरी उनसे अक्सर बातें होने लगीं और हम फिर से एक दूसरे से जुड़ गए....कुछ हफ़्तों पहले मुझे किसी काम से उस शहर के पास जाने का मौका मिला..जहाँ मेरी पढाई हुई थी और मेरी सहेलियां रहती हैं...पर जब प्रोग्राम बना तब हमें उसके पास के शहर से दूसरी ओर जाना था...सो मुझे ख़ुशी तो थी की मैं अपनी सहेलियों के पास तक जा सकुंगी लेकिन उनसे नहीं मिल पाऊँगी इस बात का अफ़सोस भी था...जब हम रायपुर पहुंचे तो पाता चला कि भारी बारिश की वजह से सभी रास्ते बंद हैं इसलिए हमें रायपुर में ही रुकना होगा...सो इस बारिश की बदौलत ही सही हमने भिलाई जाकर अपने दोस्तों से मिलने का फ़ैसला किया...

जब से अपनी सहेलियों का नम्बर और उनके बारे में पाता चला तब से ही उनसे मिलने का मन हो रहा था...लेकिन जब उनसे मिलने जा रही थी तो एक अजीब सा विचार था कि पता नहीं ११ साल बाद अब मेरी सहेलियां कैसी होंगी?...क्या वो अब भी पहले जैसी ही होंगी?....ज़रा भी बदली नहीं होंगी...?...क्या वो मुझसे मिलकर खुश होंगी..? और भी न जाने क्या-क्या...मैंने अपनी एक सहेली को स्टेशन आने के लिए कहा...मैं उसके साथ बाकि सहेलियों से मिलने जाने वाली थी...स्टेशन में पहुँचते ही मैंने उसे फ़ोन किया...वो वहां पहुँच चुकी थी...उससे मिलते ही सारे डर मन से निकल गए...वो बिलकुल उसी तरह मिली जैसे हम स्कूल में मिला करते थे...हमने ढेर सारी बातें की...बाकि सभी सहेलियों को कॉल किया...वो सभी अपने काम छोड़कर मुझसे मिलने दौड़ी चली आईं....सभी बहुत प्यार से मिलीं....हम सभी बिलकुल उसी तरह बातों में लग गए जैसे हम स्कूल के दिनों में किया करते थे...

उन ३ घंटों में हम सभी ने एक बार फिर से अपने स्कूल के दिनों को जी लिया...मुझे आश्चर्य तो हुआ और साथ ही साथ ख़ुशी भी की..मेरी सहेलियां अब भी उतनी ही प्यारी और भोली हैं...बिलकुल वैसी ही हैं जैसा मैं उन्हें छोड़ आई थी...उस दिन मुझे एक बात का अहसास हुआ कि वक्त बहुत कुछ बदल सकता है....पर मेरी सहेलियों पर उसका कोई जोर नहीं चलता...मैंने अपने इसी ब्लॉग में एक बार लिखा था कि ये रेल की पटरियां हमें हमेशा एक दूसरे से दूर कर दिया करती थीं...और ११ साल पहले उसने साजिश करके हमें बहुत दूर कर दिया...लेकिन मुझे आज समझ आया कि उस वक्त भी जब मैं पटरियों को पार करके जाती थी तो अपनी सहेलियों से मिल पाती थी...और अब ११ साल बाद भी मैंने पटरियों को पार करके अपनी सहेलियों को पा लिया...

अपनी सहेलियों से मिलकर अब ज़िन्दगी की एक बड़ी ख़ुशी है....मेरी कहानी में....


Friday, May 20, 2011

उलझे रास्तों का नया सफ़र

अभी कुछ दिनों पहले अपने हाथ के कॉर्न के लिए होम्योपथिक डॉक्टर से मिली.....ये हॉस्पिटल विले पार्ले(मुंबई)में है और वहाँ की खास बात ये है कि वो आपकी बीमारी का इलाज करने तक ही मतलब नहीं रखते...वो पहले आपके नेचर को जानते हैं...कुछ सवालों से या फिर वो आपसे ही कहते हैं कि आप अपने बारे में कुछ बताइए...यही सब मेरे साथ भी किया गया....अपने बारे में काफी कुछ मैंने उन्हें बताया...जो शायद मैंने किसी से अब तक कहा भी नहीं था....उसके बाद डॉक्टर ने मेरे सामने कुछ नए सवाल रखे,जो थे तो मेरी ही ज़िन्दगी से जुड़े लेकिन कभी मेरे सामने आये नहीं थे.....उनके इन सवालों का साइड इफैक्ट ये हुआ कि मैं दिन भर तो उनके जवाब की तलाश में अपने दिमाग को उलझाती ही रही साथ ही मेरी रातों की नींद भी इन जवाबों को ढूंढने में खो गयीं....इस तरह से कुछ दिन परेशान रहने के बाद कुछ जवाब सामने आये...जिन्होंने मेरी उलझनों को कम तो किया...लेकिन अपने साथ कुछ सवाल भी ले आये...ये सवालों और जवाबों का रिश्ता ही कुछ ऐसा है...खुद तो साथ में रहते हैं, लेकिन इंसान को दुनिया से अलग कर देते हैं....बस यही हाल मेरा भी था...फिर डॉक्टर से मिली....उसे मेरे जवाबों से कुछ अच्छा लगा....वो एक मेडिकल कॉलेज है तो हमेशा वहां सिर्फ डॉक्टर ही नहीं स्टुडेंट भी मौजूद होते हैं अपनी नोटबुक के साथ....स्टुडेंट्स तो काफी इंटरेस्ट लेते हैं मुझ पर...शायद कभी ऐसा कोई पेशेंट मिला ही नहीं होगा उन्हें...

डॉक्टर भी कहाँ मानने वाले थे...जिंदगी के कुछ और पन्ने उनके सामने रखी और उन्होंने बदले में मेरे सामने कुछ नए सवाल रख दिए,इस बार सवालों का जवाब नहीं ढूँढना था....क्यूंकि जवाब मेरे पास ही थे,मैं सही रास्ता जानते हुए भी उस पर चल नहीं पा रही थी...और डॉक्टर का यही कहना था कि "आपने अपने बीते हुए समय से खुद को कुछ इस तरह से बाँध रखा है कि आगे ही नहीं बढ़ पा रही....वहाँ आपने एक हुक फंसा रखा है...बस उसको निकलकर आगे बढ़ो...पानी की तरह खुद को बहने दो...पानी कभी एक आकार में बंधा नहीं होता...और रुका हुआ पानी भी कभी साफ़ नहीं रहता...बस जैसा दिल करता है वैसा ही करो...और आप आज़ाद हो जाओगे...उसने कहा..."अब फैसला आपको करना है कि आप किस तरह से जीना चाहते हैं...अपने बीते हुए कल की तरह या एक आज़ाद पंछी की तरह..." अब बस उसी हुक की तलाश में थी....मिल तो गया पर उसमे जंग लगी हुई है...खोलने के लिए मेहनत लगानी होगी...मेहनत लगा तो रही हूँ..पर कभी-कभी थक कर बिलकुल टूट जाती हूँ...इसी तरह कुछ उलझी हुई सी एक बार और डॉक्टर से मिल आई....एक नयी बात उनके सामने रखी जो कोई जवाब नहीं बल्कि एक सवाल ही था....लेकिन उसने उसी सवाल को कुछ बड़ा करके मेरे ही सामने रख दिया....सवाल के दो जवाब हैं और मुझे एक चुनना है....कौन सा जवाब सही है और कौन सा ग़लत..?...आज सही लगने वाला जवाब कल ग़लत भी हो सकता है और ग़लत लगने वाला जवाब सही....

अब मेरा दिमाग कुछ ऐसा उलझा है कि मैं बस उसे ही पढ़ रही हूँ और कुछ भी नहीं..सबके साथ हूँ पर उनके साथ नहीं हूँ...सिर्फ अपने साथ हूँ...और कुछ यूँ उलझी हुई हूँ कि....पता नहीं रास्ता कहाँ मिलेगा....लेकिन कुछ भी हो मैं इस बार ये खोज नहीं रोकूंगी...मेरी जिंदगी का ये सबसे बड़ा सफ़र है...और मुझे इस पर सभी रास्ते खुद ही खोजने हैं...इस अनोखे सफ़र की शुरुवात हो चुकी है...मेरी कहानी में

Friday, August 20, 2010

कोई मिल गया


आज का दिन मेरी ज़िन्दगी का सबसे सुनहरा दिन है....आज मुझे अपनी एक बिछड़ी सहेली मिल गई...राखी सिंग चंदेल...जब मैं सारी सहेलियों से बिछड़ी थी तब ये ही एक ऐसी सहेली थी जिसने पत्र-व्यवहार काफी लबे समय तक जारी रखा....लेकिन बाद में उसकी व्यस्तता बढती गई और पत्र कम होते-होते बंद हो गए....फिर घर सिफ्टिंग के समय मुझसे इसका पता भी गुम गया...और हम कभी बाते न कर सके....

वैसे मैं बहुत ज्यादा नेट चलाने वालों में से नहीं हूँ....सो ज्यादा साइट्स पर भी मेरा आना-जाना नहीं है.....कुछ दिनों पहले अपनी ममेरी और मौसेरी बहनों के कहने पर ऑरकुट ज्वाइन किया....तो मुझे लगा क्यूँ न अपनी सहेलियों को ढूंढने का प्रयास किया जाये...मुझे उनके नाम पता थे....ये पता नहीं था कि उनकी शादी हो चुकी है या नहीं...फिर भी मैंने शहर और नाम के आधार पर उनकी तलाश की....कुछ जो उनसे मिलते-जुलते लगे उन्हें पूछा भी.....आज सुबह जब नेट लगाया तो पता चला...कि मेरी इस खोज का असर हुआ है...कुछ ने मेरी सहेलियां नहीं होने के बावजूद मुझे सहेली बनाया...और सबसे ख़ुशी की बात ये हुई की...मुझे अपनी एक सहेली मिल गई...

इसी ख़ुशी को मैंने सभी के साथ बाटने की सोची और आ गई यहाँ......मैं ऑरकुट का तहे दिल से शुक्रिया अदा करना चाहती हूँ...जिसने मुझमे ये आस जगाई की शायद अब मैं अपनी सारी सहेलियों से मिल सकूं...आज सबसे बड़ी ख़ुशी का दिन है...मेरी कहानी में....

Friday, June 25, 2010

कुछ बातें

बचपन से ही जब मुझे घर पर छोड़ कर दोनों भाई स्कूल जाया करते थे....मुझे बहुत बुरा लगता था और मैं बस इंतज़ार किया करती थी....न सिर्फ उनके आने का बल्कि जल्दी से बड़ी होकर अपने स्कूल जाने का भी....और जब वो दिन आया....मेरी ख़ुशी का तो ठिकाना ही नहीं था.......मैंने कई बच्चों को रोते हुए स्कूल जाते देखा है....लेकिन मैं स्कूल जाने के लिए रोया करती थी....क्यूंकि तेज़ बारिश में कई बार रिक्शेवाले भइया नहीं आया करते थे....और घर पर इतनी दूर तक जाने के लिए साधन नहीं होता था....मुझे वाकई स्कूल बहुत पसंद था....मुझे छुट्टियां बिलकुल भी पसंद नहीं आती थी....हमारे स्कूल में दीपावली की छुट्टियां पूरे १ महीने की लगती थीं.....सभी इस बात से काफी खुश रहा करते थे....मुझे भी थोड़ी ख़ुशी होती थी कि त्यौहार अच्छी तरह मनाएंगे....लेकिन दुःख भी रहता था कि अब सहेलियों से महीने भर मिलने नहीं मिलेगा....इसका एक कारण था...हमारा स्कूल स्टील प्लांट का था....सो मेरी अधिकाँश सहेलियां रेलवे क्रॉसिंग के पार ही रहा करती थीं...जबकि हम क्रॉसिंग के इस पार रहा करते थे.....इसलिए उनसे केवल स्कूल में ही मिल पाती थी....


वैसे तो मुझे हमेशा ही उनका ख्याल रहता है....लेकिन कल मुझे उनकी बड़ी याद आ रही थी....जब हम भिलाई छोड़कर आये...तब मेरे पास अपनी कुछ सहेलियों का पता तो था....लेकिन नंबर नहीं...इस लिए अब मेरे पास अपनी स्कूल की यादों के अलावा कुछ नहीं है......पहले भी रेल की पटरियां हमें रोज़ बाँटने की साजिश किया करती थीं...लेकिन हमने उन्हें कभी सफल नहीं होने दिया....सो उन्होंने ११ साल पहले ऐसी साजिश की....कि हम आज तक नहीं मिल पाए....मुझे पूरा विश्वास है...हम पटरियों की इस साजिश को भी जल्द ही नाकाम करेंगे...

किसी भी साजिश की कोई जगह नहीं..... मेरी कहानी में.....

Friday, April 9, 2010

स्पोर्ट्स-डे की वो मार्चपास्ट

अपनी जीवन यात्रा लिखते-लिखते अचानक अतीत से वर्तमान में चली आई थी.....इससे बीच के कुछ वर्ष पीछे छूट गए...अब वो बार-बार मुझसे अपना स्थान मांग रहे हैं...कहते हैं," हमारे बिना तुम्हारी जीवन-यात्रा कैसे पूरी हो सकती है...?"......मुझे इनकी याद तो थी...लेकिन एक बार जब कोई अपने अतीत से वर्तमान में आ जाता है तो उसे वापस अतीत में जाना मुश्किल लगता है.........अगर बचपन कि बात छोड़ें..तो अधिकाँश लोगों को अपने अतीत से कोई खास लगाव नहीं होता.....लेकिन मैं उन अधिकाँश लोगों में से नहीं हूँ.....मुझे अपने अच्छी और बुरी सारी यादें प्रिय है....सो मैंने फिर से अपने अतीत को अपने यादों के पन्नों में समेटने का इरादा किया है....हो सकता है...उन यादों में जीते हुए कुछ ऐसी बातें भी याद आ जाएँ जो मेरे स्मृति पटल पर धुंधली हो चुकी हों........

स्कूल के बारे में तो जितना लिखूं उतना कम लगता है....स्कूल का हर दिन मेरे मन में अंकित है....आज स्कूल का 'स्पोर्ट्स डे' याद आ रहा है...करीब महीने भर पहले से तैयारी शुरू रहती थी....सारी क्लास को दौड़ाया जाता था...और उनमे से जितने वाली लड़कियों को एक साथ दौड़ाते थे...इस तरह कुछ १० लड़कियों को स्पोर्ट्स डे की रेस के लिए चुना जाता था......मुझे स्पोर्ट्स में कोई ख़ास दिलचस्पी तो नहीं थी...लेकिन फिर भी सहेलियों के साथ ग्राउंड में जाकर तैयारियां देखती और अगर मदद की ज़रूरत हो तो जरूर आगे रहतीं...हम कभी-कभी यूँ ही स्पोर्ट्स में पार्ट भी ले लेती....

एक बार स्पोर्ट्स डे की तैयारियों को देखने के लिए ही हमारा ग्रुप ग्राउंड में गया......मार्चपास्ट हो रहा था...एक लड़की कम हो रही थी....हमारी हिंदी टीचर ने मुझे खींचकर उस जगह पर लगा दिया...मैंने मैडम से कहा कि मुझे मार्चपास्ट नहीं आता....तो उन्होंने कहा.."...तो सीख लो....तुमको इस बार मार्चपास्ट करना है..."अब मैडम को तो कुछ बोल नहीं सकती थी...सो प्रेक्टिस में लग गयी....दूर खड़ी सहेलियां मुझे देखकर मज़े लेती रहीं॥

मार्चपास्ट....कोई आसान काम नहीं था...अब तक खड़े-खड़े देखते थे ,तो लगता था...बस हाँथ हिलाते हुए आगे बढ़ना है..और क्या...?.........सोचने और करने में क्या फर्क है ये उस दिन जाना....कभी दोनों हाँथ एक साथ आगे-पीछे होने लगते,कभी बाकियों से हाँथ-पैर का तालमेल नहीं मिलता और हाँथ टकराता....आखिरकार २ दिन मेहनत करके मार्चपास्ट की अ,ब,स तो आ गयी...पर २ दिन में परीक्षा भी देनी थी...

स्पोर्ट्स-डे के दिन आखिरी प्रेक्टिस थी....उस प्रेक्टिस के दौरान थोड़ी गलती हो गयी और दीदी ने मार्चपास्ट करने से मना कर दिया.....२ दिन पहले तक तो मैं भी यही चाहती थी..लेकिन जब मार्चपास्ट से निकाला गया...तो बहुत बुरा लगा...अगर कोई जी-जान से तैयारी करके आये और उसे परीक्षा ही देने न मिले तो वो क्या करे...?..वो खुद को फेल समझे या पास...?.....उसे तो ये जानने का मौका ही नहीं मिला॥?..हम इंसान भी अजीब होते हैं...पहले तो किसी काम को बिना मन के दूसरों के दबाव में करते हैं...लेकिन जब उस काम को करने से मना कर दिया जाये...तो उसे न कर पाने का दबाव महसूस करते हैं..


सच कहूँ तो....मुझे बहुत बुरा लगा लेकिन मैंने दीदी से कुछ नहीं कहा और अपनी सहेलियों के पास चली गयी...मेरी बात सुनकर और उतरी सूरत देखकर....वो मुझे लेकर दीदी के पास गयी और उन्हें बताया कि मैं केवल २ दिनों से ही प्रेक्टिस कर रही हूँ...और मैडम के कहने पर मुझे ये करना पड़ा....तब दीदी ने मुझे आगे से ध्यान रखने के लिए कहकर वापस ले लिया....

उस दिन की मार्चपास्ट बहुत अच्छी हुई....उस साल मैंने व्हा- ड्रेस में मार्चपास्ट किया...अगले साल स्काउट के ग्रुप में मार्चपास्ट किया..और उसके अगले साल एन सी सी के ग्रुप में मार्चपास्ट किया......अगर उस दिन मैडम मुझे मार्चपास्ट के लिए खड़े न करतीं या मेरी सहेलियां दीदी से बात न करती या दीदी मुझे वापस न लेतीं,तो शायद मैं मार्चपास्ट को चलते हुए हाँथ हिलाना ही समझती...और कभी हांथों और पैरों के तालमेल को नहीं जान पाती.......मैं आज उन सभी का धन्यवाद करती हूँ...

स्पोर्ट्स-डे की उस मार्चपास्ट से जुडी ये छोटी सी याद भी एक बड़ा स्थान रखती है....मेरी कहानी में........

Wednesday, March 3, 2010

यादों से होली

होली...........रंगों से भरा त्यौहार.....जिसमे किसी भी तबके में कोई अंतर नहीं होता.........हर एक बस रंगों से सराबोर होता है....लेकिन कोई-कोई अपने दोस्तों से दूर होकर केवल दूसरों को रंगों से खेलते हुए और खुशियाँ मानते हुए देखता है,कभी खुश होता है...तो कभी अपने दोस्तों को याद करके उदास.........और ये लिखते हुए थोडा बुरा लग रहा है...लेकिन इस होली मेरा यही हाल रहा.........होली पर कई पकवान बनाये....लेकिन रंग खेलने का कोई मौका नहीं मिला...घर पर गुलाल का टीका लगाया...और खिड़की से दूसरों को एक-दूसरे के पीछे रंग लेकर दौड़ते देखती रही....मन की होली न खेल पाने की खीज,चिडचिडाहट का रूप ले रही थी.....

कुछ देर खुद को दूसरे कामों में लगाया.....फिर पास से गाने की आवाज़ आने लगी और मुझे पिछले साल की होली की याद दिला गयी..........वैसे मुझे बचपन से होली ख़ास पसंद नहीं रही है.....मैं सिर्फ अपनी एक सहेली के साथ होली खेला करती थी...जो की रंग की जगह गुनगुना पानी फेंका करती थी.....लेकिन पिछले साल कई सहेलियां बनी...नयी सोसाइटी में होली पहली बार मनाई जा रही थी...छोटी-सी होली बनाकर जलाई गयी और रेन डांस का थीम रखा गया...हम सभी सहेलियों ने काफी मस्ती की और बहुत मज़ा आया था....कई सालों के बाद मैंने होली खेली थी...और हमें बहुत अच्छा लगा था.....लेकिन इस होली में मैं अपनी सहेलियों से दूर हो चुकी हूँ सो होली भी सुखी गयी.............

वैसे यहाँ भी होली जलाई गयी...एक बात अजीब लगी कि यहाँ कदम-कदम पर होली जलाई जा रही थी....हमारी बिल्डिंग के पास ही ३ होलियाँ जली...और आसपास जितनी भी सोसायटी हैं,सभी में एक-एक होली जलाई गयी.....इस तरह से हमेशा ग्रीन मुंबई के बारे में सोचने वाले मुंबई वासियों ने एक रात में ही मुंबई की वायु को कई गुना ज्यादा प्रदूषित कर दिया....और इस तरह से पास-पास बनी कई होलियों ने ये भी बताया की यहाँ लोगों के दिलों में भी कितनी दूरियां हैं...

Wednesday, January 20, 2010

सरस्वती-पूजा और केसरिया चावल

आज सरस्वती पूजा थी....स्कूल के दिनों में हम सुबह जल्दी स्कूल जाकर पूजा की तैयारियां किया करते थे....सरस्वती वंदना,पूजा,प्रसाद वितरण और फिर छुट्टी हो जाया करती थी.....जब से स्कूल जाना बंद किया,घर पर ही पूजा कर लिया करती...हर साल की तरह इस साल भी सरस्वती पूजा की....

सरस्वती पूजा पर केसरिया वस्त्र पहना जाता है...सरस्वती माँ के साथ-साथ उनके वाहन मोर और वीणा की भी पूजा की है..मोर की पूजा करके उसकी तरह मधुर बोलने की प्रेरणा ली जाती है....चित्र में मोर न होने पर मोरपंख की पूजा भी की जा सकती है...घर पर जो भी वाद्ययंत्र होते हैं उनकी भी पूजा की जाती है....केसरिया(बसंती) फूलों के गुलदस्ते की पूजा भी होती है....केसरिया रंग का प्रसाद चढ़ाया जाता है....सो मुझे आज एक नयी रेसिपी सिखने को भी मिली..केसरिया चावल...ये सरस्वती पूजा का मुख्य प्रसाद होता है...

आज आज मैंने भी इसी तरह पूजा करके अपने और देशवासियों के लिए माता से ज्ञान का वरदान माँगा...आज काली मंदिर जाकर सरस्वती पूजा देखने का मौका भी मिला...आज तक सरस्वती माता को सफ़ेद वस्त्र में ही देखा था...आज पहली बार माँ को केसरिये(बसंती)रंग में देखकर मैं अभिभूत हो गयी...

आप सभी को सरस्वती पूजा की हार्दिक शुभकामनायें....सरस्वती माँ आप सभी के जीवन को ज्ञान के प्रकाश से रौशन करे...

Thursday, January 14, 2010

तिल का लड्डू

मकर संक्रांति....पता नहीं लोगों को ये नाम सुनकर क्या याद आता है मुझे तो ये नाम सुनते साथ ही तिल की चक्की,लड्डू वगैरह याद आ जाते हैं...बचपन से ही इस दिन हम तिल-गुड आदि की बनी चीजें खाया और दान दिया करते थे..कई लोग खिचड़ी भी दान देते हैं....मम्मी बहुत ही स्वादिष्ट तिल की चक्की बनाते हैं.....पिछले साल पुणे में थे...वहाँ सभी एक-दूसरे को तिल की बनी हुई मिठाई देकर कहते थे.."तिल गुड घ्या...गुड-गुड बोला.."मतलब तिल-गुड खाओ...और गुड की तरह मीठा बोलो....

इस साल की संक्रांति कुछ अलग है....क्यूंकि आज तक हमने मम्मी के हांथों से बनी तिल की मिठाइयाँ ही खाई थीं...लेकिन आज पहली बार मैंने भी इसे बनाना सीखा...कुछ गड़बड़ जरूर हुई..लेकिन परिणाम अच्छा निकला....

वैसे मुझे खाना बनाना खास पसंद नहीं है....पता नहीं क्यूँ..?..मैं कई बार महिलाओं को देखती हूँ...कि वो नयी रेसिपी सीखने में पूरा समय लगाती हैं....दिन-दिन भर कुछ न कुछ नया बनाती रहती हैं....ये नज़ारा मुझे अपनी मम्मी के साथ भी देखने मिलता है....ऐसी सभी महिलाओं(मेरी मम्मी को मिलाकर)...को मेरा सलाम....शायद मैं भी कभी इनमें शामिल हो पाऊँ....

खैर...आप सभी को मकर संक्रांति की हार्दिक शुभकामनायें...

Monday, January 11, 2010

यादें..याद आतीं हैं

आज नए साल को शुरू हुए पूरे ११दिन हो चुके हैं.......वैसे तो लोग साल के आखिरी दिनों में ही साल भर का लेखा-जोखा कर लेते हैं.....लेकिन साल के आखिरी दिन मेरे लिए व्यस्तता से भरे हुए रहे.....ऐसा नहीं है कि मैं पार्टी कि तैयारियों में लगी थी....क्यूंकि मैं नए साल की शुरुआत पार्टी से करने में विश्वास नहीं रखती..........दरअसल हमने घर शिफ्ट किया.....जिसके साथ ही पुणे भी हमसे छुट गया...साथ ही साथ कई परिचित भी....ख़ुशी की बात ये रही की अब हमारा पूरा परिवार साथ होगा........पुणे को छोड़ते हुए दुःख तो हुआ क्यूंकि कई सालों के बाद मैंने यहाँ फिर से दोस्ती की............इसलिए मैं अपने नए साल के पहले ब्लॉग में अपनी पुणे की यादों को जगह देना चाहती हूँ..............ये है हमारी सोसायटी का मेनगेट....ये एशिया का सबसे लम्बा गेट है......सुबह-शाम लोगों को वॉक करने के लिए यहाँ काफी जगह है.......इसी तरह की लम्बी सड़कों, जिनमे गाड़ियों की चिल्ल-पौं नहीं थीं.....हम वॉक का आनंद लिया करते....ऐसे मे हमारा साक्षी बनता ये पीपल का पेड़....वैसे तो ये औरों के लिए एक आम पीपल का पेड़ हो सकता है....लेकिन हममें से अधिकाँश वॉक करने वाले इसे छूकर प्रणाम करना नहीं भूलते थे.....ये आदत सभी को एक-दुसरे को देखकर लगी...मुझे ये आदत मेरी इस सहेली....मृणाल से लगी....इसलिए ही मैंने इन्हें पेड़ के साथ ही यादों में रखा............
ये हैं मेरे...स्टुडेंट....अदिति,सिद्धार्थ और dong जिन्होंने मुझे स्टुडेंट से टीचर का दर्ज़ा दिलाया....वैसे इन्हें पढ़ाते हुए तो मैंने कभी इनकी तस्वीर नहीं ली....लेकिन ये तस्वीर तब की है जब मैंने इन्हें इनके अच्छे नम्बर आने पर इनाम के तौर पर इन्हें थ्री-डी फिल्म दिखाई थी.........इसके बाद से ये केवल थ्री-डी फिल्म देखने के लिए ज्यादा मेहनत करने लगे थे... इनके साथ भी मेरी काफी अच्छी जमती थी...... ये केवल dong का एक नाटक है....ये तब की फोटो है...जब एक दिन वो पढ़ते हुए सो गया था...लेकिन मेरे फोटो खींचने से पहले ही उठकर इस तरह बैठ गया.....

यहाँ मेरी और भी कई लोगों से पहचान हुई...जैसे श्रीदेवी....जो की मेरी पहली सहेली बनी...उससे मुझे जीवन को व्यवस्थित ढंग से जीने का तरीका मिला.........वो जिस तरह से अपनी जिंदगी को संभाल कर रखती...ये मुझे प्रभावित करता था.......
सुमेधा...मेरी एक ऐसी सहेली जिनके साथ मुझे अपनी चिंता नहीं करनी पड़ती....ये मुझसे ज्यादा मेरी चिंता करतीं....हमारी दोस्ती गणेश-पूजा के दौरान एक प्रतियोगिता में हुई थी,......इनकी बेटी सृष्टी से भी मेरी अच्छी दोस्ती है........

मैथिलि..से मेरी पहचान सृष्टी ने ही करवाई...पिछली गणेश-पूजा के दौरान...हम सोसायटी में फंड जमा करने के लिए साथ में जाते थे..... हम सभी सृष्टी के घर पर जमा होते...और बहुत सारी मस्ती होती...फंड जमा करने में कितना मज़ा है...ये मुझे इस साल पता चला....अब तक चंदा देने से मना करने के बहाने पता थे....लेकिन इस साल पैसे जमा करने का गुर सीखा...

कुछ
ऐसे भी लोग हुए जिनसे पूरे परिवार की जान-पहचान बनी....जैसे की हमारे पडोसी....इनके दोनों बच्चे मेरे स्टुडेंट थे.....अदिति और आदित्य....उनकी मम्मी का व्यवहार बहुत ही अच्छा था...हमारे पुणे छोड़ने से ठीक पहले...इन्होने हमारी काफी मदद की....मेरी मम्मी के साथ भी इनकी अच्छी जमती थी....

यादें तो और भी है......बस ख़ुशी इस बात की है कि इस बार मुझे इन यादों को संजोने का समय मिला...........

Monday, November 23, 2009

सुनहरी रेत का.घरौंदा

बचपन में रेत के घरौंदे तो हम सभी ने बनायें हैं ...वो सुनहरी..गीली रेत का गुम्बदनुमा घर बनाकर उसके भीतर हाथों से सुरंगें बनाना.....मैं और मेरी सहेली भी यूँ ही खेला करते थे...ये सुरंगें जब पूरी हो जातीं और दोनों के हांथ मिल जाते तो.......हमारी खुशी का कोई ठिकाना ही रहता था....किसी के हांथों से ये सुरंग बिखरती तो...उस पर रेत से ही वार होता...........कई-कई बार माँ से डांट पड़ती...."रेत में मत खेला करो.....पूरा सर रेत से भरा है.....तुम लोग घरौंदे रेत में बनाते हो या सर पर..."

इन रेत के घरौंदों की याद तो हमेशा ही नवरात्रि में ताज़ा हो जाती है...जब ज्वार बोने के लिए रेत लायी जाती है....सच कहूँ ,तो किसी न किसी तरह साल में एक ब़ार...यूँ ही रेत का घरौंदा बनाने का मौका मिल जाता है.....हर साल की तरह इस साल भी नवरात्रि में रेत लाई गई...घरौंदे बनाने की चाह फिर से जागी...भागकर रेत का थैला हाँथ में लिया....लेकिन ये क्या हुआ...मेरी सुनहरी रेत को...?....ये काली कब से हो गई....?............उस सुनहरी सी रेत का सुनहरा रंग कहीं खो गया था.....वो तो ऐसी लग रही थी;जैसे बरसों से बीमार हो और अब कमजोरी आ गई हो......और इस कमजोरी ने उसका अल्हड सुनहरा रंग उससे छीन लिया हो....जिसके कारण वो बेरंग...बेजान-सी हो गई है............

इस साल घरौंदा नही बनाया मैंने...जो परेशान हो उससे खेलकर उसे और परेशान तो नही करना चाहिए ?...........नौ दिनों तक वो घर पर रही...और फिर इसी आशा के साथ उसे विसर्जित किया...कि शायद उसे अपना खोया हुआ रूप वापस मिल जाए...............बाकी जगहों के बारे में तो पता नही लेकिन यहाँ तो ऐसी ही रेत मिलती है.....हो सकता है ये रेत का एक अलग रूप हो....या प्रदूषण का प्रकोप.....लेकिन मेरी तो यही इच्छा है की अब की नवरात्रि में,मैं अपनी सुनहरी सखी से फिर से मिल पाऊँ.......

Thursday, August 27, 2009

पापाजी,मान जाइये

पापाजी....बचपन में कितनी ही बार इनकी गोद में खेली...वे मुझे कई नामों से बुलाते...गुडिया,नन्ही राजकुमारी...और भी जाने क्या-क्या...?...पापाजी मुझे भाइयों से ज्यादा प्यार करते....पहली बार उनके साथ ही स्कूल गई...मुझे याद है..एक दिन मैंने उनके साथ सामान सप्लाई करने के लिए जाने की जिद की थी और वे मुझे ले कर भी गए थे...उन्हें मेरी वजह से परेशानी भी हुई थी...वो हमेशा मुझे प्रोत्साहित करते...जब पहली बार मैंने डर से गाना नही गया था...तब भी उन्होंने मुझे बहुत समझाया था...और मैं बाद में गा सकी...

दिन बीतते गए...जैसे-जैस बचपन दूर जाता गया पापाजी से भी दूरी बढती गई...उनसे उतनी खुलकर बातें नही होतीं थी,जितनी बचपन में हुआ करतीं थीं...पापाजी के साथ पता नही कैसे विचारों का मतभेद सामने आने लगा...उन्हें अक्सर वे बातें अच्छी नही लगतीं थीं जो मैं करती या करना चाहती...मैं कई बार वो काम नही करती जो उन्हें पसंद नही होते.....बीच में एक ऐसा वक्त आया जब मुझे लगने लगा कि पापाजी किसी भी काम को करने की इजाजत नही देंगे...मैं पहले ही उस काम के लिए मना कर देती...उनसे पूछे बगैर..पता नही शायद वो मुझे उस काम की इजाजत दे भी देते,लेकिन मैंने कोशिश ही नही की....वैसे उन्होंने मुझे कई बार ऐसे कामों की इजाजत भी दी..जिनके लिए मैंने "न"ही सोच लिया था..जैसे जींस पहनने की इजाज़त,डांडिया के लिए इजाज़त....

इस तरह से मैं उनसे कटती सी गई....और कुछ सालों बाद मेरी इस ग़लतफ़हमी ने उग्र रूप लिया...और मैं उनकी बातों का विरोध करने लगी...वैसे मैं वो काम करती नही थी...लेकिन उनसे बहस जरूर करने लगी थी...हर बार बेवजह की बहस करने के बाद अपने अन्दर एक ग्लानी जरूर महसूस करती थी...लेकिन गलती ये ही रही की उनसे कभी माफ़ी नही मांगी...बहस के बाद कई दिनों तक आपसी बातें कम होतीं....फ़िर सब कुछ सामान्य हो जाता...लेकिन महीने में दो-तीन बार ऐसा हो जाता था.....

कुछ दिनों में मेरी बदतमीजीयां बढ़ने लगीं...कई बार तो ऐसा होता की मेरा जवाब ही"नही"से शुरू होता...इस वजह से मैंने जल्द ही पापाजी को अपने ख़िलाफ़ कर लिया...मुझे तो इन बातों का एहसास ही नही होता..अगर मेरे भाई ने मेरा ध्यान इस और न दिलाया होता...और जब मुझे अपनी गलतियों का एहसास हुआ...तो मैं अपने आपको इस काबिल भी नही पाई कि मैं उनसे माफ़ी मांग सकूं...जानती हूँ की मुझे फ़िर भी माफ़ी मांगनी चाहिए थी...लेकिन मैंने यहाँ भी गलती की और उनसे कुछ नही बोली...

मैंने अपने आप में सुधार लाने की सोची..अब ये रास्ता आसान नही था...क्यूंकि मेरी आदत हो चुकी थी जवाब देने की और पापाजी को भी अब मेरी सारी बातें बुरी लगती थी...मैं अब तक अपनी कोशिश में लगीं हूँ...लेकिन मतभेद तो अब भी हैं....अब कई बार अगर मैं जवाब में सही बातें भीं कहतीं हूँ...तो उन्हें बुरी लगतीं हैं...उन्हें ऐसा लगता है कि मैं हर हाल में उनकी बात का विरोध ही करना चाहती हूँ....कई बार तो बहुत बुरा लगता है...वो इस तरह से मुझे ग़लत समझ लेते हैं कि विश्वास ही नही होता..कई बार रोना आ जाता है..लेकिन इसमे उनका कोई दोष भी तो नही है..ये सब मेरा ही किया धरा है...खैर मेरी कोशिश अब भी जारी है...कभी न कभी तो मैं इस बिगड़ी बात को जरूर बना पाऊँगी...

पापाजी से मैं सिर्फ़ इतना ही कहना चाहूंगी...कि मैं मानती हूँ की अक्सर गलती मेरी ही होती है..लेकिन कभी-कभी आप भी मेरी भावनाओं को समझने की कोशिश जरूर कीजियेगा...

Sunday, August 16, 2009

स्वतंत्रता दिवस

पिछले कुछ दिनों से "स्वाइन फ्लू"के डर ने सभी को यूँ घेरा था...कि कोई भी बिना किसी जरूरी काम के बाहर नही निकलना चाहता....लेकिन इसे भुला कर सभी ने बड़े उत्साह से"स्वतंत्रता दिवस"मनाया....मैं भी अपनी"हाऊसिंग सोसायटी"के द्वारा आयोजित समारोह में शामिल हुई...लहराते हुए तिरंगे को देखकर मन को एक अनोखा आनंद मिला...और सभी के साथ एक स्वर में "राष्ट्रगीत" गाकर अपने स्कूल के दिनों की यादें ताज़ा हो गयीं.....यहाँ भी भाषण हुआ लेकिन ये अन्य वर्षों से अलग रहा...इस बार देशभक्ति और शहीदों की बातें करने की बजाय "स्वाइन फ्लू" की बातें की गयीं.....

स्कूल के दिनों में अगस्त महिना शुरू होते ही १५ अगस्त की तैयारियां होने लगतीं थी....मार्चपास्ट,गाने,भाषण आदि में हम सभी व्यस्त रहते...१५ अगस्त के दिन भी सुबह ५ बजे उठकर जल्दी-जल्दी तैयार होकर स्कूल पहुँचकर सबसे आगे खड़े होना...ताकि हम सारे कार्यक्रम ठीक से देख सकें......जैसे ही तिरंगा फहराया जाता...उसमे लिपटे फूल आसपास गिर जाते...और सभी नज़रों ही नज़रों में अपने पसंदीदा फूलों को चुन लेते.....जैसे ही सारे कार्यक्रम खत्म होते..सब अपने पसंदीदा फूलों को उठाने के लिए कूद पड़ते....बाद में सभी को "संतरे के स्वादवाली कैंडी और बिस्किट"मिलते.....आज भी हर २६ जनवरी और १५ अगस्त को वो "संतरा गोली" बहुत याद आती है(वो संतरे के स्वाद की होती थी और गोल होती थी..इसलिए उसे "संतरा गोली"कहा करते थे)...बिस्किट तो मिल जाते हैं,लेकिन वैसी "संतरा गोली"आज तक फ़िर नही मिली...

स्कूल के दिन खत्म होने के बाद तो २६ जनवरी और १५ अगस्त में तिरंगा फहराते देखना भी मुश्किल होने लगा था..लेकिन पिछले कुछ सालों से फ़िर से ये सौभाग्य मिलने लगा है....इस वर्ष मन में एक खटका था कि पता नही "स्वाइन फ्लू"की वजह से ये कार्यक्रम कहीं रद्द न हो जाए...लेकिन लोगों ने "स्वतंत्रता दिवस"पर मानो अपने इस डर से भी आजादी पा ली थी...स्वाइन फ्लू से डरने की बजाय उससे बचाव के तरीके अपनाने की जरूरत है....

इस वर्ष स्वतंत्रता दिवस सभी के लिए एक स्वतंत्रता लेकर आया...काफ़ी दिनों बाद सभी से मिलकर बहुत अच्छा लगा....यहाँ भी हमने चॉकलेट खाई...... लेकिन मन "संतरा गोली" के स्वाद को नही भुला पाया....कुछ चीजें ऐसी होतीं हैं,जिनका स्थान कोई नही ले सकता...कोई भी ,महंगी से महंगी चॉकलेट भी उस ५० पैसे की "संतरा गोली"के स्वाद की बराबरी नही कर सकती......

Thursday, August 6, 2009

ट्यूशन का भूत

पिछले महीने से मैंने ट्यूशन पढाना शुरू किया....बच्चों के नखरे-बहाने देखकर मजा भी आता है...गुस्सा भी...उन्हें पढाते हुए मुझे भी अपने ट्यूशन के पहले दिन की याद आती है......ये सभी तो फ़िर भी पहले दिन अच्छी तरह से पढने आ गए थे......जब मैं पहले दिन ट्यूशन पढने गई थी....वो दिन तो आज भी नही भूली हूँ...

मेरा अक्षर ज्ञान और प्रारंभिक पढ़ाई तो घर पर ही हुई...मम्मी ने ही मुझे सिखाया...और बाकी कॉमिक्स से सीखी....लेकिन जब मेरे स्कूल में एडमिशन की बात आई तो पता नही क्यूँ?.....दाखिले के लिए जो टेस्ट देना था...उसकी तैयारी के लिए मम्मी-पापाजी ने मुझे ट्यूशन भेजना तय किया...पहले तो मुझे समझ ही नही आया कि अब तक तो मम्मी ही पढाते थे...तो मुझे टेस्ट कि तैयारी के लिए ट्यूशन क्यूँ भेजा जा रहा है....?

पहले दिन मम्मी मुझे छोड़ने गए....मैं तब तक कभी अजनबियों के पास अकेली नही गई थी....मम्मी तो मुझे छोड़कर घर आ गए....ट्यूशन वाली मैडम ने मम्मी को एक घंटे बाद आने को कहा....मम्मी के जाने के बाद उसने मुझे "ऐ टू जेड और अ से ज्ञ" तक लिखने कहा...मैंने कॉपी निकाली..लेकिन इससे पहले की मैं कुछ लिखती मैडम के घर की एक औरत जो की देखने में पागल लग रही थी..मेरे बगल में आकर बैठ गई....मेरी तो डर के मारे हालत ख़राब हो गई....लिखना तो दूर की बात थी मैं तो वहाँ से उसी वक्त भागना चाहती थी....

मैडम मुझे लिखने के लिए बोलती रही और मैं भगवान से मम्मी के जल्दी आने की प्रार्थना करती हुई रोती रही...आखिरकार भगवान ने मेरी सुनी..और मम्मी जरा जल्दी आ गए....मम्मी के आते ही मैडम ने शिकायतों की झड़ी लगा दी..."आप की बेटी को तो कुछ भी नही आता....लिखने के लिए बोली तो बैठकर रो रही है...आप तो बोल रहीं थीं..इसको सारे अक्षर आते हैं,लिख भी लेती है...ये कुछ भी नही जानती..."

उसकी बातों से मम्मी हैरान थे...मुझसे भी पूछा कि मैंने लिखा क्यूँ नही...लेकिन मैंने वहाँ कुछ नही कहा....खैर घर वापस आते समय जब मैंने मम्मी को सारी बात बताई...तो वो हंसने लगीं...और बाद में ये तय हुआ कि मम्मी ही मुझे पढायेंगे....मुझे ट्यूशन नही भेजा जायेगा....


बस ट्यूशन का वो पहला दिन ही मेरे ट्यूशन का आखिरी दिन रहा...उसके बाद से आज तक कभी भी मैं ट्यूशन नही गई...लेकिन वो एक दिन के ट्यूशन का अनुभव मुझसे भुलाए नही भूलता.....

Friday, July 3, 2009

रिक्शेवाले भइया


स्कूल दूर होने की वज़ह से हमें कई सालों तक रिक्शे की रोज़ सवारी का मौका मिला.इन ८-९ वर्षों में हमने कई रिक्शे बदले....इस वज़ह से हमें सारे रिक्शेवाले भइया का नाम तो याद नही है,लेकिन २ रिक्शावाले भइया हमें हमेशा याद रहेंगे....एक अपने नाम की वजह से और एक अपने अनोखे रिक्शे की वज़ह से।

जिन्हें नाम की वज़ह से याद करती हूँ वो है.....दिसम्बर.पता नही उन्हें ऐसा नाम क्यूँ मिला?लेकिन उनके नाम की वज़ह से उन्हें भूलना मुश्किल था....कभी आने में देर हो जाती थी तो किसी भी दूसरे रिक्शेवाले भइया से उनकी जानकारी आसानी से मिल जाती थी।

जब हम रिक्शे में जाया करते थे....तो एक रिक्शे में कम से कम आठ से ग्यारह बच्चे तो होते ही थे....ज्यादा हो सकते थे पर कम नही.इससे में हर एक सीट पर बैठना चाहता था....जिसके लिए हर एक के लिए सीट और टब पर बैठने का दिन निर्धारित किया करते थे....इसके लिए कई बार लड़ाई भी होती थी.सीट के सामने की पटिया केवल लकड़ी की होने के कारण जल्दी से कोई उसपर बैठना पसंद नही करता था....यही लड़ाई का सबसे अहम् मुद्दा होता था।

इन सभी लडाइयों का सामना हर एक रिक्शे में करना पड़ा.... रिक्शेवाले तो रिक्शा बदलने से बदल जाते थे पर रिक्शे वही लगते और सीट के हक़ की लड़ाई भी वही रहती नए चेहरों के साथ......लेकिन जब एक बार हमने रिक्शा बदला तो हमें रिक्शेवाले भइया के साथ-साथ रिक्शा भी बदला-बदला लगा.अगर मैं इसे एक शान्तिप्रिय रिक्शा कहूं तो शायद सही रहेगा.....यहाँ कभी भी सीट के लिए कोई लड़ाई नही होती थी.....कोई भी कहीं भी बैठने को तैयार रहता.कारण ये था कि ये शहर का एकमात्र ऐसा रिक्शा था,जिसमे सीट और पटिया में कोई भेद नही किया गया था....पूरा रिक्शा गद्देदार था.....ये रिक्शा था दुकालू भइया का.इसे उन्होंने अपनी इच्छानुसार ख़ुद बनवाया था ये बाकी रिक्शों से बड़ा भी था।

विसेस कुछ सालों बाद हमने रिक्शे जन छोड़ कर साइकिल कि सवारी शुरू करी....लेकिन रिक्शे की यादें साथ ही रहीं.स्कूल के लिए करीब घंटे भर पहले निकलना,छुट्टी के बाद भी वापस आने से पहले सबको घर छोड़ते हुए आने मिलता,कई नए दोस्त भी बनते....(मेरी एक ऐसी दोस्त रिक्शे में ही बनी थी,जो कि मेरे रिक्शा बदलने के बाद भी मुझे इत्तेफाक से हर रिक्शे में मिल ही जाती थी)बरसात में चारों ओर से मोटी प्लास्टिक से ढंके रिक्शे में बैठे-बैठे स्कूल से घर पहुंचना,रस्ते में पड़ने वाले पेडों से फूल-फल तोड़ने की कोशिश,पेपर के दिनों में सबके हाँथ में कॉपी और साथ पढ़ते-पढ़ते जाना,भइया से रिक्शे की रेस लगवाना और जीतने पर खुश होना,आपस में कितनी भी लड़ाई हो लेकिन कोई दूसरे रिक्शे का बच्चा अपने रिक्शे के बच्चे से लादे तो एकजूट होकर उसकी ओर से लड़ना...........ऐसी कितनी ही यादें हैं।


आपके रिक्शे कि तरह का कोई भी रिक्शा आज तक नही देखने मिला दुकालू भइया.....और न ही आपके नाम का कोई व्यक्ति मिला दिसम्बर भइया.आज भी आप अपने रिक्शे में बच्चों को स्कूल लेकर जाते होगे....आज भी सीट के झगडे होते होंगे....शायद कल वो भी इस तरह आपको याद करेंगे.

Saturday, June 6, 2009

सच्चा दोस्त

आज सुबह एक दोस्तों के ग्रुप को देखी.....हँसी-मजाक करते हुए,एक दुसरे की खिंचाई करते हुए....मुझे भी अपने स्कूल के वो दिन याद आ गए,जब हम सभी सहेलियों का ग्रुप इसी तरह की मस्ती करता था.हमारी क्लास डे शिफ्ट होने के कारण हमारा अधिकांश समय स्कूल में सहेलियों के साथ ही बीतता था....घर पर आकर भी स्कूल की बातें ही होतीं थी.....हम सभी सहेलियां तो एक-दुसरे का जन्मदिन भी स्कूल में ब्रेक के टाइम मनाया करतीं थी,क्यूंकि हममें से कईयों के घर काफी दूर थे.हम आठ सहेलियां साथ में पढ़ते,घूमते,खेलते,गाने गाते,अपनी खुशियों को बांटते,परेशानियों को भी सुलझाते.....इसी तरह हमारे दिन बीत रहे थे.तभी अचानक पापाजी का ट्रांसफर होने के कारण मुझे अपनी सहेलियों से बिछड़ना पड़ा....अपने हर दिन की कल्पना अपनी सहेलियों के साथ करने वाली मैं उनसे अलग होकर कैसे रहूंगी ये सोच भी नही पा रही थी.

अपनी सहेलियों से बिछड़कर मेरा हाल बुरा था...दिन भर रोती थी,सोचती रहती थी कि वो अभी क्या कर रही होंगी?,अपनी सहेलियों के जन्मदिन पर उनके लिए प्रार्थना करती.वैसे कुछ समय तो हमारा पत्र-व्यवहार भी चला....फ़िर दूरियां इन पर भी हावी हो गयीं.कुछ महीनों के बाद मैं भी संभल गई थी.उड़ीसा में होने के कारण मैंने अपनी आगे की पढ़ाई पत्राचार से की(इसमें मेरी मदद मेरी एक सहेली राखी ने पत्र के द्वारा की,उसे हमारी क्लास टीचर चतुर्वेदी मैडम ने जानकारी दीं थी)....पत्राचार से पढ़ाई करने के कारण मुझे केवल पेपर के समय ही नए दोस्त बनाने का मौका मिलता था...वैसे मैं कुछ लोगों से बात तो करती थी,लेकिन मैंने कभी नए दोस्त बनने की कोशिश ही नही की...शायद मैं अपनी सहेलियों कि जगह सुरक्षित रखना चाहती थी या मुझे नए दोस्त बनाकर उन्हें भी खोने का डर था.

पत्राचार से पढ़ाई करते हुए मुझे एक और परेशानी का सामना करना पड़ा....अकेले पढने का.वैसे स्कूल में मेरी कॉपी हमेशा अप-टू-डेट रहती थी,लेकिन पढ़ाई मैं केवल परीक्षा के समय करती थी...पेपर में कोई उत्तर नही भी आता था,तो क्लास में पढाये अनुसार उत्तर बना लिया करती थी....लेकिन अब तो मुझे ही पूरी पढ़ाई करनी होती थी...न कोई टीचर,न कोई क्लास.इस परेशानी का हल मैंने इस तरह निकाला कि एक ओर मैं ही टीचर बन जाती थी और दूसरी ओर विद्यार्थी भी मैं ही.जब पढ़ते-पढ़ते कुछ समझ में नही आता...तो ख़ुद ही टीचर कि तरह अपने आप को समझाती और समझ में आ जाता.पढ़ाई अच्छी तरह होने के साथ ही इससे एक और फायदा मिला.......मेरी ख़ुद से ही दोस्ती हो गई,जो की आज तक कायम है।

ख़ुद से दोस्ती करने से मेरा अकेलापन भी मुझे बहुत अच्छा लगने लगा...ऐसा नही है कि मैं अपनी सहेलियों को भूल गई...वो आज भी मुझे अज़ीज़ हैं.ख़ुद से दोस्ती करके मैंने मैंने खुश रहने के साथ-साथ अपनी गलतियों के बारे में जाना,अपनी परेशानियों को दूर करना सीखा,अब हर वक्त मेरी ये दोस्त मेरे साथ है और मुझे पता है की ये हमेशा मेरे साथ रहेगी चाहे परिस्थितियाँ कैसी भी हों।

जिंदगी में दोस्तों की बहुत अहमियत है.दोस्तों से जिंदगी खुशनुमा बनती है...लेकिन अगर दोस्तों से बिछड़ भी जाएँ,तो जिंदगी में आगे बढ़ना ही अच्छा है.दोस्त जरूरी है,लेकिन उनके सहारे ही जिंदगी जीने की कल्पना ग़लत है.जीवन में ऐसे कई मोड़ आते है,जहाँ आपके सभी दोस्त पीछे रह जाते है...आपके साथ हमेशा रहता है सिर्फ़ आपका वजूद.....और वही आपका सच्चा दोस्त है.

Monday, June 1, 2009

जो कह न सकी

माँ....एक ऐसा शब्द जिसे बच्चा सबसे पहले कहता है.मेरी माँ...जिन्हें मैंने हर वक्त अपने साथ पाया....मुश्किल पलों में सहेली के रूप में,जीवन की कठिन राहों में मार्गदर्शक के रूप में,अकेलेपन में सहारे के रूप में....पहली बार मम्मी को छोड़ कर कही गई तो वो था मेरे स्कूल का पहला दिन....उसके बाद रोज़ पाँच घंटों की दूरी रहती थी...रविवार को छोड़ कर।

स्कूल में नई सहेलियां जरूर बनीं,लेकिन मम्मी ही मेरी बेस्ट फ्रेंड रहीं;अपनी हर बातें मैंने उनके सिवा आज तक अपनी किसी फ्रेंड से नही बांटी...घर वापस आकर स्कूल की छोटी से छोटी बात उन्हें बताती थी...जैसे की उन्हें भी अपनी जानकारियों से अपडेट करना चाहती थी,इसी वजह से जब भी किसी सहेली से कोई बात हो जाया करती तो मम्मी से वो बात कहने में मुझे कभी भूमिका नही बनानी पड़ती थी....क्यूंकि वो सभी को मेरी बातों से जानते थे।

कभी कोई सवाल हल न हो रहा हो या किसी प्रश्न का उत्तर नही आ रहा हो...हल मम्मी के पास मिलता है.....मेरे विषय अलग होने के बाद भी मैं केवल सवाल पूछने से पहले नियमों को बता कर सवाल पूछती तो कोई न कोई हल जरूर मिल जाता नही तो कोई ऐसा सुझाव मिलता जिससे सवाल हल करने में सुविधा होती.एक निश्चित उम्र में जो बातें मुझे पता होनी चाहिए थीं,बड़ी ही सहजता से पता चलती गयीं....आज सोचती हूँ तो समझ आता है की परिस्थितियों को ही इतना सहज बनाया गया था की ये सभी बातें भी सहजता से समझ आतीं चलीं गई.

स्कूल के दिनों के बाद कई बार मम्मी से कई-कई महीनों अलग रहना पड़ा...फ़ोन पर भी बात नही होती थी,फ़िर भी वो साथ ही लगतीं थी.मुझे याद है जब मैं १२ वी की परीक्षा के लिए मामाजी के घर गई थी.....मैंने मम्मी के बारे में एक बुरा सपना देखा.....सुबह आँख खुली तो मैं रोते-रोते ही उठी.....सपना भी बहुत सुबह का था और मैंने सुन रखा था कि सुबह का सपना सच होता है....रो-रोकर मेरा हाल बुरा हो गया था.वैसे तो मैं बचपन से रोने के लिए मशहूर थी....खासकर मामाजी जब घर वापस आते तब मेरे नाम की एक धुन सीटी से बजाते थे और वो धुन सुनते ही मेरा रोना सुरु हो जाता था...इस वजह से मामाजी को नानीजी से डांट भी खानी पड़ती थी और वो कहते-"मैंने तो सिर्फ़ सीटी बजाई है".........लेकिन उस दिन का मेरा रोना देखकर सभी बहुत परेशान हो गए,काफी देर सभी ने मुझे समझाया तब जाकर मेरा रोना बंद हुआ....वैसे इस बात को काफ़ी दिनों तक आपस में सब ने सुनाया.वैसे ही एक बार जब मेरे पेपर के बीच में मम्मी मुझसे मिलने आए और जब वापस जाने लगे तो अचानक लगा की बाकि सारे पेपर छोड़ कर मम्मी के साथ चली जाऊं।

आज सोचती हूँ,तो पाती हूँ की कई बार मैंने मम्मी का दिल दुखाया है....कई बार बिना कुछ सोचे समझे जवाब दे दिया...कई बार अनजाने में मुह से कोई ऐसी बात निकल गई जो उन्हें तकलीफ दे गई और कुछ पलों बाद मुझे भी...मेरी गलती ये रही की मैंने इसके लिए भगवान् से तो माफ़ी मांगी लेकिन अपनी माँ से नही.मुझे पता है;इसके माँ तो माफ़ कर देंगी...लेकिन भगवान् नही!

कुछ महीनों पहले मम्मी की तबियत ख़राब हो गई थी....उन्हें हॉस्पिटल ले जाना पड़ा.....हॉस्पिटल पहुँचने पर उन्हें स्ट्रेचर पर सुलाया गया(उन्हें बहुत चक्कर आ रहे थे) इस हालत में मैंने अपनी माँ को नही पहले कभी नही देखा था....उस वक्त उन्हें देखकर कैसा लगा ये शायद बता नही पाऊँगी,बस इतना बता सकती हूँ कि,मुझे अपने आंसू छिपाने की नाकाम कोशिश करनी पड़ी.....मम्मी पाँच दिन बाद घर आए,लेकिन हॉस्पिटल में भी उन्हें हमेशा घर की चिंता रहती थी....सब ठीक से खाना खा रहे है की नही,काम का ज्यादा बोझ मत लेना,तुम लोग को फालतू में परेशान कर रही हूँ,वगेरह,वगेरह.मुझे भी घर पर सारे दिन बेचैनी रहती थी की कब रात हो और मैं मम्मी के पास जाऊँ।

आज तक मैंने बहुत गलतियां की हैं.....जिनके लिए मुझे बिना कुछ कहे माफ़ी मिली है.....मेरी माँ तो सबसे अच्छी माँ हैं.....पता नही मैं कैसी बेटी हूँ?इतना तो पता है की मैं एक परफेक्ट बेटी नही हूँ,जो अपनी माँ को हमेशा खुश रखे,उनसे कभी कोई बुरी बात न कहे,अपनी गलतियों के लिए माफ़ी मांगे....लेकिन हाँ,कहीं न कहीं मैं इस सुधार के रस्ते पर चलना तो चाह रही हूँ और मुझे आज भी जरूरत है एक मार्गदर्शक की.....अपनी माँ की।

इस पोस्ट के जरिये अपनी माँ को वो सभी बातें कहना चाहती हूँ,जो कभी उनसे रूबरू नही कर पाई.मेरी सभी गलतियों के लिए मुझे माफ़ करना....माँ.

Thursday, May 28, 2009

स्कूल का पहला दिन

आज अचानक अपने स्कूल का पहला दिन याद आ गया.छोटी होने के कारण कई फायदे तो थे लेकिन नुकसान भी था...मुझे घर पर सारे दिन अपने भाइयों के स्कूल से घर आने का इंतजार करना पड़ता था,इस बोरियत को मिटाने के लिए मम्मी मुझे अक्षर ज्ञान और लिखना सिखाते थे......इसी वजह से मैं स्कूल जाने से पहले ही कॉमिक्स पढने लगी थी या यूँ भी कहा जा सकता है की मैंने कॉमिक्स से ही पढ़ना सीखा.

आखिरकार मेरा स्कूल में दाखिला हुआ...मैंने पहले पहली का वार्षिक परीक्षा का पेपर हल किया,फ़िर दूसरी के दाखिले का....इस तरह मुझे सीधे दूसरी कक्षा में दाखिला मिला.स्कूल हमारे घर से बहुत दूर था....पहले दिन पापाजी मुझे छोड़ने आए और लेने भी.मेरी पहली क्लास टीचर थीं "ठाकुर मैडम",उन्होंने ही मेरी दोस्ती पहले दिन दो लड़कियों.....आयशा और पूनम से करवाई,ये दोनों पढने में बहुत होशियार थीं.

स्कूल का पहला दिन बहुत ही अच्छा रहा...मेरा तो स्कूल जाने का शौक ही पूरा हो गया था,वापस घर आकर मैंने अपनी स्कूल की सारी बातें मम्मी को बताई....स्कूल के पहले दिन से लेकर आज तक ये सिलसिला जारी है.मेरे रोज सारी बातें इस तरह से बताने के कारण मेरे दोनों भाई मुझे कहते-"तू मम्मी को साथ में स्कूल ले जाया कर,तो तुझे रोज़ आकर स्कूल पुराण नही गाना पड़ेगा"....लेकिन मैं नही सुधरी।

एक साल बाद पापाजी की पहचान वाली मैडम,जिन्होंने मेरे दाखिले में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी,ने मुझे अपनी क्लास में ले लिया,जिसके कारण क्लास के बीच की दूरी....मेरे और मेरी सहेलियों के बीच भी आ गई.इस नई क्लास में कई लोगों से मेरी दोस्ती हुई...उनमे से एक थी....गाइड....क्यूंकि वर्मा मैडम(मेरी २ री क्लास टीचर)सिंगर थीं....और शायद पढाना उनका पार्ट टाइम जॉब था,तो हम गाइड से ही पढ़ते थे.मुझे आज तक समझ नही आया कि उन्होंने मुझे अपनी क्लास में लेकर अच्छा किया या बुरा?खैर यहाँ मुझसे जिन्होंने भी दोस्ती की,उन्होंने मुझे बहुत परेशान किया.ये लडकियां एक माफिया गैंग की तरह थीं....क्लास की बाकी लड़कियों से अपना काम पूरा करवाना,उनके टिफिन खाना,यहाँ तक की पेपर के समय भी ये यही सारे काम करती थीं.....बताने में बुरा तो लग रहा है,लेकिन हाँ मैं भी उन बाकी लड़कियों में शामिल थी.मम्मी के होते हुए मेरी पढ़ाई में कोई फर्क नही पड़ा और रिजल्ट में भी नही......लेकिन मेरी वजह से उनके रिजल्ट जरूर प्रभावित हुए।

जब मुझे स्कूल जाते हुए एक-दो हफ्ते हुए थे तभी वर्मा मैडम ने मुझे क्लास से स्टाफ-रूम में बुलाया....इस छोटे से रस्ते में ही मैंने अपनी बातों को सोच कर उसमें से अपनी गलतियां निकालने की कोशिश की,लेकिन फायदा नही हुआ,क्यूंकि स्टाफ-रूम आ गया था.अन्दर घुसते हुए ही मेरे आंसू मेरी आंखों के बिल्कुल पीछे छुप कर अपने बाहर आने का इंतजार करने लगे.तभी मैडम ने एक कागज हाथ में देते हुए कहा.."इसे पढो,ये गाना गाकर सुनाओ...मैं जैसा बोलती हूँ...वैसा-वैसा बोलो........सबसे अच्छा दिन इतवार ......बोलो",बस....मुझे याद नही की मैंने दो या चार कितनी लाइन बोलीं.....हाँ गाना पूरा होने से पहले ही मेरे आंसू निकल आए....और मुझे मिला एक अच्छा मौका निकल गया...तब ही मैडम ने पापाजी से कह दिया था कि,"मैं आपकी बेटी को और कभी गाने को नही कहूँगी....मैंने कुछ भी नही किया और वो सिसक-सिसक कर रो रही थी"।

आख़िरकर मुझे ख़ुद ही पांचवी में मैडम को बोलना पड़ा कि,"मैडम मैं गाने में रहना चाहती हूँ"और हमने चार गाने गाये.इस तरह प्रायमरी ख़त्म हुई...अब हमें बगल वाली गर्ल्स स्कूल में दाखिला लेना था,जिसके बारे में हमारी स्कूल में अफवाह थी कि वहाँ के हॉल में पाँच लड़कियों का भूत रहता है...जो कि दशहरा-दीपावली कि एक महीने की छुट्टी के दौरान वहाँ बंद हो गयीं थीं.हम इस स्कूल में एक बार पहले अपनी सहेली के साथ उसकी बहन की क्लास गये थे....ये बहुत ही बड़ा स्कूल था,अगर उसकी बहन हमें बाहर छोड़ने नही आती तो शायद हम बाहर नही आ पाते।

इस नए स्कूल में पढने के लिए मैं बहुत खुश थी....साथ ही साथ भगवान् से प्रार्थना कर रही थी की किसी तरह मेरा अपनी इन सभी सहेलियों से पीछा छुट जाए और मैं नई सहेलियां बनाऊं,भगवान् ने मेरी सुन ली.इस नए स्कूल में,नई क्लास में मुझे एक नई सहेली भी मिली....कविता साहू....मेरे दोनों भाई मुझे इसका नाम ले लेकर चिढाते भी थे,क्यूंकि मैं इसके बारे में कोई मज़ाक बर्दास्त नही कर पाती थी.इसके अलावा भी मुझे यहाँ कई सहेलियां मिलीं और भी कई बातें यहाँ से जुड़ी हुई हैं....जिन्हें बाद में बताऊंगी.